बहुत दिन हो गए कुछ कहा नहीं, ऐसा नहीं कोई विचार आया नहीं। मगर सिर्फ़ कहना ही तो लक्ष्य नहीं है। अगर कुछ कहा जाए और कहने में कोशिश हो कशिश न हो, तो अच्छा है खामोश हवाएं गुज़ारा करें और हम उनमें शब्दों की हलचल न डालें। मगर जब कहे बिना रहा न जाए, कोशिश ki thakan न जुबान को हो न रूह को, तो शब्द हवा में घुल कर भी उसके प्रवाह को श्रृंगार ही देंगे। ऐसे शब्द अक्सर तूफानों के गुजरने के बाद ही सुनाई देते हैं। जब सन्नाटा होता है, रूह और आवाज़ में अन्तर न पता चलता हो, तो धीरे धीरे, हलके कई शब्द बुलबुले बन उभर आते हैं, और वो सच्चे हल्के शांत शब्द बहुत कुछ कह देते हैं।
शायद यही कारण है, दुनिया की श्रेष्ठतम कृतियाँ तूफानों के बाद लिखी गई हैं। अब तूफ़ान चाहे दिखे या न दिखे। चाहे वह बाहर से भीतर आया हो, जैसे राजनितिक परिवर्तनें, (कार्ल मार्क्स, रूसो) या भीतर ही उपजा हो, (तुलसी, सूर)।
भारतीये इतिहास भीतर की गतिविधियों का है। अभी भी भारतीये मानस राजनीती से उतना नहीं डोलता जितना अन्तर के किसी तार से , अब चाहे वह सास-बहु चिट्ठों से आया हो या फिर आसाराम बापू से। भारतीये मानस भीतर से बाहर तरफ़ जीने का प्रयास है। पाश्चात्य चिंतन बाहर को पकड़ने की कोशिश। बाहर के इलेक्ट्रानिक्स को पकड़ा आपने, भीतर के इलेक्ट्रानिक्स से जोड़ा हमने। आपने मोबाइल बनाये और हम घंटों उसपर अपने दोस्त से बतियाये। अब आप मोबाइल बना सकते हैं, दोस्त नहीं। और हमें दोस्त बनाना आता था इसलिए मोबाइल बनाने में समय नहीं लगाया।
मगर आपका मोबाइल काम कर गया, और हमारे सब दोस्त मोबाइल ho gaye । आपका मोबाइल हमारी दोस्ती पर हावी हो गया। आपकी हर तकनीक कामयाब हो गई। बाहर की चकाचौंध से हम भीतर की खोज भूल गए, और इसलिए शब्दों की कमी पड़ गयी। कहें भी तो क्या कहें? शब्दों की भी kadra होनी चाहिए। अब यहाँ का समाचार wahan udel देना यह bahari बात थी। और paschat जगत में यह ज़रूरी है। जैसे पाश्चात्य जगत की एक देन है vigyan। यहाँ आप अपनी बात नहीं कह सकते। apke अन्तर जगत से कोई लेना देना नहीं है। आपको वही kahna पड़ेगा जो adhikansh लोग कह रहे हैं। yane बाहर से भीतर की तरफ़। आप अपने abhivyakti में swatantra नहीं हैं। Lie detector kahega की कोई झूठ बोल रहा है की नहीं। अपने दिल की बात मत poochiye।
तो ऐसे में शब्दों की कमी lazimi है। आदमी dara हुआ है की kahin उसके शब्द sarak पर pahchan न लिए जायें। की kahin वह chaurahe पर apne shabdon ki अलग shakhsiyat से अलग sa न दिखे।
sahas को अब bewakoofi कहते हैं और zindagi को machini ही jina उचित है। तो शब्द कहाँ से आए। केवल vicharon का कट paste हो सकता है। और वह तो केवल puravartan होगा, vistar नहीं।
रविवार, अगस्त 17, 2008
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