बुधवार, जुलाई 08, 2009

एक सहमा सा चिटठा

शब्द सामर्थ्य हैं।
सामर्थ्य का दुरूपयोग हो सकता है।
शब्दों का दुरूपयोग हो सकता है ।
सामर्थ्य स्वयं भी दुरुपयोग को प्रेरित करती है ('Power corrupts') ।

आज समस्या शब्दों की कमी से नही है।
सामर्थ्य की समस्या नही है।
समस्या सामर्थ्य के दुरूपयोग से है।

शब्द आज अधिक शक्तिशाली हैं।
अंतरजाल ने और अधिक सामर्थ्य दिया है शब्दों को।
बहुत दूर तक, बे रोकी टोक चले जाते हैं ये।
इसलिए अधिक ज़रूरी है की शब्दों का चयन बारीकी से हो।

मेरे पिता ने मकान बनाया,
एक एक ईंट चुन कर रखी,
ताकि पड़ोसियों की नज़र में आए,
हर गुजरने वाले आकर्षित हों।
हम में कोई खुश नही था,
मकान मकान नही रहा ,
दुकान हो गया।

हमारे शब्द हमारी आत्मा का निवास हैं।
शरीर बेमानी है इस युग में,
आत्माएं शब्दों में निवास करती हैं।

कहाँ कौन देख पाता है इस अंतरजाल पर शरीरों को?
आत्मा की पहचान ये शब्द हैं।
शब्द वो मकान है जिसमे हमारे वजूद का निवास है।
प्रयास है एक मकान बनायें !

मचान भी बनाया जा सकता है,
जो दूर से दिखे,
शायद उस पर रात भी काटी जा सकती है,
मगर ज़िन्दगी कटेगी मुश्किलों से।

आज सब कुछ बिकता है,
दिखना ज़रूरी है,
इसलिए घर भी दुकान हो गया गया है ।
आत्माएं दुखी हैं , इन्द्रियों के लिए बहुत सामान हो गया ।

बिकना ज़रूरी है,
दिखना ज़रूरी,
क्या होना भी ज़रूरी है?
मेरा 'होनेपन' पर ज़ोर है,
इसलिए सही शब्द दूंढ़ रहा हूँ।
उस मकान के लिए इंटें ढूंढ रहा हूँ,
जिसमे मेरी आत्मा संतुष्ट हो।
पड़ोसियों का क्या,
उन्हें तो बस एक नज़र देखना है।
कभी अन्दर आयें तो मेरे शब्द भी सुंदर लगेंगे,
सौंदर्य उनके बहाव में नही होगा,
सौंदर्य उनके ठहराव में होगा।
धुनें न हों, भले बेताल हों,
मगर अर्थ हो, जो गहरे उतरे।
जो रुके उसे आराम मिले,
बाहर का आकर्षण घातक है।
स्वर्ण भस्म चमकता नही है,
और सोना खाया नही जा सकता।
समुन्दर की लहरों में मोती नही है,
और गहरे कोई हलचल नही।
आकर्षण इन्द्रियों को हावी करता है,
आत्मा दुखी होती है।

इसलिए शब्दों पर ज़ोर है,
अभी शब्द मेरे कमज़ोर हैं।
डरा सा मैं लेखनी कागज़ से मिलाता हूँ,
कहीं अभिव्यक्ति की मह्त्वाकांक्षा,
मेरे कमज़ोर शब्दों को गुलाम न बना ले,
और मेरी आत्मा एक सुकून के घर के लिए हमेशा तरसती रह जाए।