शुक्रवार, मई 22, 2009

ज़िन्दगी रफ्तार से भाग रही हैं,
मगर वहम जिंदा हैं, आस भी जाग रही हैं।

हर दिन कई सुबह
हर सुबह को जागना,
ज़िन्दगी जागी हुई हैं,
अगली सुबह तक मानना,

हर दौर से मुश्किल,
यह दौर ज़िन्दगी का,
जब न 'मैं' हैं, न मेरेपन का अहसास,
बस भागना और भ्रम खुदी का |

राह पे सोना हैं राह पे सुबह भी,
राह से झगड़ना, राह से सुलह भी,
कहाँ जाना, कहाँ से चले,
नही समय अब औ न फिकर ही।

भाग रही हैं ज़िन्दगी,
बस भागती हैं ज़िन्दगी।

सुना था खुदा ने कोई ख्वाब बुना था,
दुनिया बनाने का इक मकसद रखा था,
इंसा भागता ताउम्र बेमकसद बेज़रूरत,
क्या यही खुदा ने किस्मत रचा था?

ज़िन्दगी के लिए, ज़िन्दगी से अलग ,
न खुदा, न खुदाई बस भागने की ललक ,
यह कहाँ जा रहा हैं ख्वाब खुदा का,
क्या खुदा से बड़ी हैं इन्सान की ललक?

चलो रुक चुका कुछ अधिक देर मैं,
न और सोंच सकता अधिक देर मैं,
भागना ही गर किस्मत अगर इस दौर,
चलो भाग कर देखूं कुछ और देर मैं।