आज फिर मैंने किसी को मुस्कुराते देखा,
आज फिर मुझे डर लगा।
पिछली बार मैंने गलती की थी,
प्रतिउत्तर में मुस्कुरा दिया था,
और उम्मीद को जगह दे दी थी।
बाद में उन्होंने कहा था,
मैं तो ऐसे ही मुस्कुराया था।
कोई बुरी बात तो नही?
मैं कुछ कह नही पाया था।
क्योंकि मैं तब तक जानता नही था,
कि ऐसे ही मुस्कुराया जाता है,
मेरी समझ में मुस्कान एक अभिव्यक्ति थी,
व्यक्ति के अन्तर के स्थिति की,
मैं नही जानता था,
अब अभिव्यक्ति का स्थान नही है,
किसी भी व्यव्हार में।
अब अर्थ नही होता किसी भी मुस्कान में।
'ऐसे ही' मुस्कुराया जाता है,
'ऐसे ही' सम्बन्ध बनाया जाता है,
और 'ऐसे ही' ज़िन्दगी जी जाती है.
तो मैं सावधान था इस बार,
और उनकी मुस्कान,
पूरी कोशिश के बाद भी असफ़ल रही,
मेरी आंखों ने गहरे पीया उस मुस्कान को,
और एक खामोशी में घुला दिया।
बाद में उस मुस्कान ने कही गहरे जगह ले ली,
और मुझमे ग्लानी भर दी,
उत्तर के अभाव में,
उस मुस्कान ने मेरे व्यक्तित्व,
की नीव पर प्रहार किया,
और वह मुस्कान फिर सफल हुई।
मैं समझ सका,
क्यों बात उठती है सन्यास की।
सन्यास दर्द से पलायन नही है,
मुस्कानों से भागने का प्रयास है।
क्योंकि मुस्कान प्रतिउत्तर खोजती हैं,
और सम्बन्ध बनाती हैं,
बाहर में ।
भीतर गहरे ,
कही भी कुछ नही हो रहा होता है,
और मुस्कानें व्यर्थ ही समय बर्बाद करती हैं,
ज़िन्दगी को ऊपर ही ऊपर जीने में।
सब जहग आज मुस्कुराने का प्रयास है,
भीतर गहरे की अनभियक्ति को छुपाने का प्रयास है,
और यह मुस्कान सब जगह फ़ैल जाती है,
बिना किसी गहरे अस्तित्व के,
और समाज भरा दीखता है मुस्कुराते हुए,
बहुत से दुखी लोगों से।
सो मैंने सोचा है,
इस दुःख को अब और नही विस्तार द्दोंगा,
जहाँ तक होगा,
मुस्कानों को व्यर्थ फैलने से रोकूंगा।
जब तक एक कारण नही होगा,
एक सच्ची मुस्कान के लिए,
अबसे मुस्कानों का प्रतिउत्तर नही दूँगा।
गुरुवार, अगस्त 27, 2009
बुधवार, जुलाई 08, 2009
एक सहमा सा चिटठा
शब्द सामर्थ्य हैं।
सामर्थ्य का दुरूपयोग हो सकता है।
शब्दों का दुरूपयोग हो सकता है ।
सामर्थ्य स्वयं भी दुरुपयोग को प्रेरित करती है ('Power corrupts') ।
आज समस्या शब्दों की कमी से नही है।
सामर्थ्य की समस्या नही है।
समस्या सामर्थ्य के दुरूपयोग से है।
शब्द आज अधिक शक्तिशाली हैं।
अंतरजाल ने और अधिक सामर्थ्य दिया है शब्दों को।
बहुत दूर तक, बे रोकी टोक चले जाते हैं ये।
इसलिए अधिक ज़रूरी है की शब्दों का चयन बारीकी से हो।
मेरे पिता ने मकान बनाया,
एक एक ईंट चुन कर रखी,
ताकि पड़ोसियों की नज़र में आए,
हर गुजरने वाले आकर्षित हों।
हम में कोई खुश नही था,
मकान मकान नही रहा ,
दुकान हो गया।
हमारे शब्द हमारी आत्मा का निवास हैं।
शरीर बेमानी है इस युग में,
आत्माएं शब्दों में निवास करती हैं।
कहाँ कौन देख पाता है इस अंतरजाल पर शरीरों को?
आत्मा की पहचान ये शब्द हैं।
शब्द वो मकान है जिसमे हमारे वजूद का निवास है।
प्रयास है एक मकान बनायें !
मचान भी बनाया जा सकता है,
जो दूर से दिखे,
शायद उस पर रात भी काटी जा सकती है,
मगर ज़िन्दगी कटेगी मुश्किलों से।
आज सब कुछ बिकता है,
दिखना ज़रूरी है,
इसलिए घर भी दुकान हो गया गया है ।
आत्माएं दुखी हैं , इन्द्रियों के लिए बहुत सामान हो गया ।
बिकना ज़रूरी है,
दिखना ज़रूरी,
क्या होना भी ज़रूरी है?
मेरा 'होनेपन' पर ज़ोर है,
इसलिए सही शब्द दूंढ़ रहा हूँ।
उस मकान के लिए इंटें ढूंढ रहा हूँ,
जिसमे मेरी आत्मा संतुष्ट हो।
पड़ोसियों का क्या,
उन्हें तो बस एक नज़र देखना है।
कभी अन्दर आयें तो मेरे शब्द भी सुंदर लगेंगे,
सौंदर्य उनके बहाव में नही होगा,
सौंदर्य उनके ठहराव में होगा।
धुनें न हों, भले बेताल हों,
मगर अर्थ हो, जो गहरे उतरे।
जो रुके उसे आराम मिले,
बाहर का आकर्षण घातक है।
स्वर्ण भस्म चमकता नही है,
और सोना खाया नही जा सकता।
समुन्दर की लहरों में मोती नही है,
और गहरे कोई हलचल नही।
आकर्षण इन्द्रियों को हावी करता है,
आत्मा दुखी होती है।
इसलिए शब्दों पर ज़ोर है,
अभी शब्द मेरे कमज़ोर हैं।
डरा सा मैं लेखनी कागज़ से मिलाता हूँ,
कहीं अभिव्यक्ति की मह्त्वाकांक्षा,
मेरे कमज़ोर शब्दों को गुलाम न बना ले,
और मेरी आत्मा एक सुकून के घर के लिए हमेशा तरसती रह जाए।
सामर्थ्य का दुरूपयोग हो सकता है।
शब्दों का दुरूपयोग हो सकता है ।
सामर्थ्य स्वयं भी दुरुपयोग को प्रेरित करती है ('Power corrupts') ।
आज समस्या शब्दों की कमी से नही है।
सामर्थ्य की समस्या नही है।
समस्या सामर्थ्य के दुरूपयोग से है।
शब्द आज अधिक शक्तिशाली हैं।
अंतरजाल ने और अधिक सामर्थ्य दिया है शब्दों को।
बहुत दूर तक, बे रोकी टोक चले जाते हैं ये।
इसलिए अधिक ज़रूरी है की शब्दों का चयन बारीकी से हो।
मेरे पिता ने मकान बनाया,
एक एक ईंट चुन कर रखी,
ताकि पड़ोसियों की नज़र में आए,
हर गुजरने वाले आकर्षित हों।
हम में कोई खुश नही था,
मकान मकान नही रहा ,
दुकान हो गया।
हमारे शब्द हमारी आत्मा का निवास हैं।
शरीर बेमानी है इस युग में,
आत्माएं शब्दों में निवास करती हैं।
कहाँ कौन देख पाता है इस अंतरजाल पर शरीरों को?
आत्मा की पहचान ये शब्द हैं।
शब्द वो मकान है जिसमे हमारे वजूद का निवास है।
प्रयास है एक मकान बनायें !
मचान भी बनाया जा सकता है,
जो दूर से दिखे,
शायद उस पर रात भी काटी जा सकती है,
मगर ज़िन्दगी कटेगी मुश्किलों से।
आज सब कुछ बिकता है,
दिखना ज़रूरी है,
इसलिए घर भी दुकान हो गया गया है ।
आत्माएं दुखी हैं , इन्द्रियों के लिए बहुत सामान हो गया ।
बिकना ज़रूरी है,
दिखना ज़रूरी,
क्या होना भी ज़रूरी है?
मेरा 'होनेपन' पर ज़ोर है,
इसलिए सही शब्द दूंढ़ रहा हूँ।
उस मकान के लिए इंटें ढूंढ रहा हूँ,
जिसमे मेरी आत्मा संतुष्ट हो।
पड़ोसियों का क्या,
उन्हें तो बस एक नज़र देखना है।
कभी अन्दर आयें तो मेरे शब्द भी सुंदर लगेंगे,
सौंदर्य उनके बहाव में नही होगा,
सौंदर्य उनके ठहराव में होगा।
धुनें न हों, भले बेताल हों,
मगर अर्थ हो, जो गहरे उतरे।
जो रुके उसे आराम मिले,
बाहर का आकर्षण घातक है।
स्वर्ण भस्म चमकता नही है,
और सोना खाया नही जा सकता।
समुन्दर की लहरों में मोती नही है,
और गहरे कोई हलचल नही।
आकर्षण इन्द्रियों को हावी करता है,
आत्मा दुखी होती है।
इसलिए शब्दों पर ज़ोर है,
अभी शब्द मेरे कमज़ोर हैं।
डरा सा मैं लेखनी कागज़ से मिलाता हूँ,
कहीं अभिव्यक्ति की मह्त्वाकांक्षा,
मेरे कमज़ोर शब्दों को गुलाम न बना ले,
और मेरी आत्मा एक सुकून के घर के लिए हमेशा तरसती रह जाए।
रविवार, जून 14, 2009
भारतीये संस्कृति का इतिहास और आधुनिक युवा मन
संस्कृति प्रवाह है। यह बात सर्व विदित है।
नदियों की तरह, इसमें भी समय समय पर नयी विचार- धारायें मिलती रहती हैं ।
पर क्या धाराओं के साथ साथ नदी का स्रोत भी बदलता है? और क्या स्रोत के सूख जाने पर नदी की पह्चान वही रहती है? यदि नही, तो नदी की हर मोड़ को अपने स्रोत का ध्यान रखना होगा, अपनी पहचान के लिए और उससे कहीं अधिक अपने अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता में।
भारतीये संस्कृति में भी कई प्रवाह जुड़े हैं। मगर क्या उससे उसके उदगम का कोई महत्व नही रह जाता? क्या वर्त्तमान को सींचने वाली शाखाओं में अब भी सबसे अधिक योगदान उसके अतीत का ही नही है? तो प्रश्न उठता है- अपने स्रोत पर चिंतन आज युवा मन क्यों नही कर पा रहा? कहीं बाद में जुड़ने वाली धाराओं ने अपनी मूल शाखा के प्रति इतनी घृणा तो नही पैदा कर दी की वर्त्तमान अपने आधार को ही भूल रहा है?
यह बात ज़रूर है कि तट का लाभ उठाने वालों में कोई ही भगीरथ होता है। किसी विशेष के मन में ही यह कौतुहल होता है नदी का स्रोत जानने की। असके भगीरथ को पहचानने की। और कोई विशेष लाभान्वित ह्रदय ही उस भगीरथ को सर नवाता है। यह विडम्बना तब बहुतायत होती है जब वर्त्तमान के पास विराम के क्षणों की कमी हो जाती है।
चिंतन अवकाश चाहती है। शरीर को सजीव रखने में ही जब संपूर्ण सामर्थ्य खर्च हो रहा हो तो स्रोत के चिंतन की उम्मीद नही की जा सकती। ऐसे में वर्त्तमान को क्षमा करना ही होगा। पर यदि वर्त्तमान मन की उच्छृंखलता में समय व्यतीत कर रहा हो तब स्रोत को उसे क्षमा नही करना चाहिए। भारतीये संस्कृति आधार रही है भारतीयों के वैश्विक स्तर पर मिली सफलताओं की । ऐसे में उस स्रोत पर चिंतन होना ही चाहिए।
इस संस्कृति ने सदियों आक्रान्ताओं को सहजता से सहा है। जो आक्रमण के पश्चात् लौटना नही चाहे उन्हें भी इसने आत्मसात किया है।
to be continued...
समय की कमी से अधूरा छोड़ना पड़ रहा है। जैसी कृष्ण की मर्ज़ी । हरे कृष्ण।
नदियों की तरह, इसमें भी समय समय पर नयी विचार- धारायें मिलती रहती हैं ।
पर क्या धाराओं के साथ साथ नदी का स्रोत भी बदलता है? और क्या स्रोत के सूख जाने पर नदी की पह्चान वही रहती है? यदि नही, तो नदी की हर मोड़ को अपने स्रोत का ध्यान रखना होगा, अपनी पहचान के लिए और उससे कहीं अधिक अपने अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता में।
भारतीये संस्कृति में भी कई प्रवाह जुड़े हैं। मगर क्या उससे उसके उदगम का कोई महत्व नही रह जाता? क्या वर्त्तमान को सींचने वाली शाखाओं में अब भी सबसे अधिक योगदान उसके अतीत का ही नही है? तो प्रश्न उठता है- अपने स्रोत पर चिंतन आज युवा मन क्यों नही कर पा रहा? कहीं बाद में जुड़ने वाली धाराओं ने अपनी मूल शाखा के प्रति इतनी घृणा तो नही पैदा कर दी की वर्त्तमान अपने आधार को ही भूल रहा है?
यह बात ज़रूर है कि तट का लाभ उठाने वालों में कोई ही भगीरथ होता है। किसी विशेष के मन में ही यह कौतुहल होता है नदी का स्रोत जानने की। असके भगीरथ को पहचानने की। और कोई विशेष लाभान्वित ह्रदय ही उस भगीरथ को सर नवाता है। यह विडम्बना तब बहुतायत होती है जब वर्त्तमान के पास विराम के क्षणों की कमी हो जाती है।
चिंतन अवकाश चाहती है। शरीर को सजीव रखने में ही जब संपूर्ण सामर्थ्य खर्च हो रहा हो तो स्रोत के चिंतन की उम्मीद नही की जा सकती। ऐसे में वर्त्तमान को क्षमा करना ही होगा। पर यदि वर्त्तमान मन की उच्छृंखलता में समय व्यतीत कर रहा हो तब स्रोत को उसे क्षमा नही करना चाहिए। भारतीये संस्कृति आधार रही है भारतीयों के वैश्विक स्तर पर मिली सफलताओं की । ऐसे में उस स्रोत पर चिंतन होना ही चाहिए।
इस संस्कृति ने सदियों आक्रान्ताओं को सहजता से सहा है। जो आक्रमण के पश्चात् लौटना नही चाहे उन्हें भी इसने आत्मसात किया है।
to be continued...
समय की कमी से अधूरा छोड़ना पड़ रहा है। जैसी कृष्ण की मर्ज़ी । हरे कृष्ण।
शनिवार, जून 13, 2009
पांडिचेरी और मैं
मेरे मैंपने में कुछ घटा है यहाँ पांडिचेरी आकर।
न सिर्फ़ 'मैं' का कद घटा है बल्कि मैंपने को नापने का पैमाना भी बदला है।
'मैं ' शुरुआत है आदमी की । वेद कहता है सबसे ऊपर, मन बुद्धि से भी ऊपर अहं है । नीचे इन्द्रियां हैं, जिससे वह संसार को जानता है। ख़ुद की शुरुआत तो होती है 'अहं' से, जहाँ से जीव ब्रह्म से अलग होता है। मगर ख़ुद को जानने का प्रयास होता है इन्द्रियों से। मैं कैसा लग रहा हूँ, लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मेरा स्थान संसार में कहाँ है इत्यादि। यह सभी मन और इन्द्रियों पर आधारित हैं। बुद्धि चाहे जितनी माथा पच्ची कर ले, नचाती तो उसे इन्द्रियां ही हैं। मगर यहाँ आकर मेरे मैंपने को समझने का पैमाना बदला है।
लोग कहते हैं ऋषि अगस्त्य की यहाँ कुटिया थी।
मैं नही जानता, मगर मानता हूँ , रही होगी ।
मानने में कोई हर्ज़ नही है। अगर नही रही होगी तो मेरा क्या जाएगा और अगर कही रही होगी तब तो मेरी चांदी है। वैसे भी अंदाज़ से दुनिया चल रही है। Newton ने अंदाज़ से प्रयोग किए। कुछ सही निकल गए तो आज वह बहुत बड़ा scientist माना जाता है। दुनिया ऐसी ही है। प्रयोग अपने लिए होते हैं । उसकी असफलताएं अपने लिए होती हैं। सफलता संसार में बाँट दी जाती है। जैसे परीक्षा पास की आपने, सफल हुए तो उसका लाभ सबको मिला। मगर असफलता अपने लिए होती है। असफलता ज्ञान देती, और सफलता संसार देती है। ज्ञान अपने लिए होता है। ज्ञान कभी भी किसी को दिया नही जा सकता। इसलिए असफलता अपने लिए होती है। तो मैं भी प्रयोग कर रहा हूँ। मान रहा हूँ की यहाँ अगस्त्य मुनि का आश्रम था। और शायद उसका कोई प्रभाव अभी भी है।
और अगर अगस्त्य ऋषि न भी रहे हों तो ऋषि औरोबिन्दो तो ज़रूर थे।
वह तो इतिहास का विषय है। उनकी पुस्तकें और ब्रिटिश सरकार की फाईलें इसका प्रमाण हैं।
अद्भुद जगह है पांडिचेरी। और यह मैं लिख रहा हूँ ७ महीने रहने के बाद। साधारणतया किसी जगह का अनुभव समय के साथ अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इन्द्रियों का स्वाभाव ही ऐसा है। वह हर समय कुछ नया चाहती हैं। इसलिए पुरानी चीजें अपना आकर्षण खो देती हैं। शायद इसलिए ही परमात्मा ने शरीर बदलने की भी व्यवस्था की है। अगर इस शरीर से मन नही भरा तो दूसरा लेकर देखो। मगर यहाँ कुछ अलग हो रहा है। पांडिचेरी के अनुभव में शायद इन्द्रियां नही हैं। शायद यह मन और बुद्धि से परे का कोई भोग हो रहा है। आकर्षण दिन प्रति दिन बढता ही जा रहा हो।
एक ही शब्द आता है मेरे मानस में पांडिचेरी के लिए। 'शांत' । बस शांत। और कुछ भी नही। कोई हलचल भी नही, कोई कौतुहल ही नही। और यह वो शांति भी नही है जो समुद्र से आती है । समुद्र के पास अगर आप देर तक बैठें तो उसकी लहरें आपके अन्दर एक अजीब सी शांति पैदा करती हैं। बिडम्बना की समुद्र जैसे अशांत का ऐसा प्रभाव कि जो 'शांताकार' है, शांति का स्थान है (विष्णु) वह उसके अन्दर निवास करता है। यहाँ आकर मैंने कुछ कुछ अनुभव किया है, उस शांति का जो 'शांताकार' श्री विष्णु के सानिध्य से आता है।
इस शांति में कोई प्रयास नही है। कहीं जाने का उद्देश्य नही है । बस होना है। मगर इसका यह अर्थ नही कि यहाँ कुछ होता नही है, शहर रुका हुआ है। बिल्कुल नही, वह चल रहा है, कहीं धीरे, कहीं तेज। मगर इन सबके ऊपर एक शांति की चादर जैसे बिछी हो। वातावरण में कोई एक प्रकाश हो जो इन सारी गतिविधियों में एक रंग भर रहा हो। रंग ऐसा नही जो सबको एक सामान कर दे, एकाकार कर दे, बल्कि ऐसा रंग जो सब रंगों को मौलिक कर दे और साथ ही यह भी दिखे की कोई रंग चढा है इन सब पर।
पांडिचेरी की चर्चा अधूरी रह जायेगी अगर मैं 'मदर' को इसमें शामिल नही करुँ तो। क्योंकि वह रंग शायद मदर का है जिसके अनुभव की बात मैं कर रहा हूँ। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसके विचारों से मैं बहुत प्रभवित हुआ हूँ। राष्ट्र के प्रति जो संवेदना मैंने विवेकानंद में अनुभव किया था, उससे कही अधिक तड़प मैं मदर के विचारों में पता हूँ। मदर की मौजूदगी अभी भी इस छोटे शहर में है। मदर ने मानवता की जो झांकी अपने प्रयासों से संसार के सामने रखी है वह व्यापक है। ब्रह्म की चेतना जिस प्रकार समग्र सृष्टि में ओत प्रोत अनुभव होती है, वही स्वरुप मदर के चिंतन में झलकता है। यहाँ के लोग मदर को परमात्मा मानते हैं । ,मैं साधारण जानो की बात नही कर रहा, हालाँकि यहाँ का साधारण जन भी अध्यात्मिक स्तर में इतना असाधारण है की मैं उसकी थाह नही पाता हूं, बल्कि यहाँ के जो साधक हैं वे सभी सांसारिक उपलब्धियों में, चाहे वह धनार्जन हो या विद्वता, श्रेष्ठ हैं। और उनका यह मानना की मदर परमात्मा हैं, मायने रखता है । मेरे मानस में अभी बहुत कुछ नही समाया है। शायद यही कारण है की अभी कौतुहल बाकी है, और आकर्षण बढता ही जा रहा है। देखे आगे मेरे अनुभव में क्या घटित होता है।
हरे कृष्ण !
न सिर्फ़ 'मैं' का कद घटा है बल्कि मैंपने को नापने का पैमाना भी बदला है।
'मैं ' शुरुआत है आदमी की । वेद कहता है सबसे ऊपर, मन बुद्धि से भी ऊपर अहं है । नीचे इन्द्रियां हैं, जिससे वह संसार को जानता है। ख़ुद की शुरुआत तो होती है 'अहं' से, जहाँ से जीव ब्रह्म से अलग होता है। मगर ख़ुद को जानने का प्रयास होता है इन्द्रियों से। मैं कैसा लग रहा हूँ, लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मेरा स्थान संसार में कहाँ है इत्यादि। यह सभी मन और इन्द्रियों पर आधारित हैं। बुद्धि चाहे जितनी माथा पच्ची कर ले, नचाती तो उसे इन्द्रियां ही हैं। मगर यहाँ आकर मेरे मैंपने को समझने का पैमाना बदला है।
लोग कहते हैं ऋषि अगस्त्य की यहाँ कुटिया थी।
मैं नही जानता, मगर मानता हूँ , रही होगी ।
मानने में कोई हर्ज़ नही है। अगर नही रही होगी तो मेरा क्या जाएगा और अगर कही रही होगी तब तो मेरी चांदी है। वैसे भी अंदाज़ से दुनिया चल रही है। Newton ने अंदाज़ से प्रयोग किए। कुछ सही निकल गए तो आज वह बहुत बड़ा scientist माना जाता है। दुनिया ऐसी ही है। प्रयोग अपने लिए होते हैं । उसकी असफलताएं अपने लिए होती हैं। सफलता संसार में बाँट दी जाती है। जैसे परीक्षा पास की आपने, सफल हुए तो उसका लाभ सबको मिला। मगर असफलता अपने लिए होती है। असफलता ज्ञान देती, और सफलता संसार देती है। ज्ञान अपने लिए होता है। ज्ञान कभी भी किसी को दिया नही जा सकता। इसलिए असफलता अपने लिए होती है। तो मैं भी प्रयोग कर रहा हूँ। मान रहा हूँ की यहाँ अगस्त्य मुनि का आश्रम था। और शायद उसका कोई प्रभाव अभी भी है।
और अगर अगस्त्य ऋषि न भी रहे हों तो ऋषि औरोबिन्दो तो ज़रूर थे।
वह तो इतिहास का विषय है। उनकी पुस्तकें और ब्रिटिश सरकार की फाईलें इसका प्रमाण हैं।
अद्भुद जगह है पांडिचेरी। और यह मैं लिख रहा हूँ ७ महीने रहने के बाद। साधारणतया किसी जगह का अनुभव समय के साथ अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इन्द्रियों का स्वाभाव ही ऐसा है। वह हर समय कुछ नया चाहती हैं। इसलिए पुरानी चीजें अपना आकर्षण खो देती हैं। शायद इसलिए ही परमात्मा ने शरीर बदलने की भी व्यवस्था की है। अगर इस शरीर से मन नही भरा तो दूसरा लेकर देखो। मगर यहाँ कुछ अलग हो रहा है। पांडिचेरी के अनुभव में शायद इन्द्रियां नही हैं। शायद यह मन और बुद्धि से परे का कोई भोग हो रहा है। आकर्षण दिन प्रति दिन बढता ही जा रहा हो।
एक ही शब्द आता है मेरे मानस में पांडिचेरी के लिए। 'शांत' । बस शांत। और कुछ भी नही। कोई हलचल भी नही, कोई कौतुहल ही नही। और यह वो शांति भी नही है जो समुद्र से आती है । समुद्र के पास अगर आप देर तक बैठें तो उसकी लहरें आपके अन्दर एक अजीब सी शांति पैदा करती हैं। बिडम्बना की समुद्र जैसे अशांत का ऐसा प्रभाव कि जो 'शांताकार' है, शांति का स्थान है (विष्णु) वह उसके अन्दर निवास करता है। यहाँ आकर मैंने कुछ कुछ अनुभव किया है, उस शांति का जो 'शांताकार' श्री विष्णु के सानिध्य से आता है।
इस शांति में कोई प्रयास नही है। कहीं जाने का उद्देश्य नही है । बस होना है। मगर इसका यह अर्थ नही कि यहाँ कुछ होता नही है, शहर रुका हुआ है। बिल्कुल नही, वह चल रहा है, कहीं धीरे, कहीं तेज। मगर इन सबके ऊपर एक शांति की चादर जैसे बिछी हो। वातावरण में कोई एक प्रकाश हो जो इन सारी गतिविधियों में एक रंग भर रहा हो। रंग ऐसा नही जो सबको एक सामान कर दे, एकाकार कर दे, बल्कि ऐसा रंग जो सब रंगों को मौलिक कर दे और साथ ही यह भी दिखे की कोई रंग चढा है इन सब पर।
पांडिचेरी की चर्चा अधूरी रह जायेगी अगर मैं 'मदर' को इसमें शामिल नही करुँ तो। क्योंकि वह रंग शायद मदर का है जिसके अनुभव की बात मैं कर रहा हूँ। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसके विचारों से मैं बहुत प्रभवित हुआ हूँ। राष्ट्र के प्रति जो संवेदना मैंने विवेकानंद में अनुभव किया था, उससे कही अधिक तड़प मैं मदर के विचारों में पता हूँ। मदर की मौजूदगी अभी भी इस छोटे शहर में है। मदर ने मानवता की जो झांकी अपने प्रयासों से संसार के सामने रखी है वह व्यापक है। ब्रह्म की चेतना जिस प्रकार समग्र सृष्टि में ओत प्रोत अनुभव होती है, वही स्वरुप मदर के चिंतन में झलकता है। यहाँ के लोग मदर को परमात्मा मानते हैं । ,मैं साधारण जानो की बात नही कर रहा, हालाँकि यहाँ का साधारण जन भी अध्यात्मिक स्तर में इतना असाधारण है की मैं उसकी थाह नही पाता हूं, बल्कि यहाँ के जो साधक हैं वे सभी सांसारिक उपलब्धियों में, चाहे वह धनार्जन हो या विद्वता, श्रेष्ठ हैं। और उनका यह मानना की मदर परमात्मा हैं, मायने रखता है । मेरे मानस में अभी बहुत कुछ नही समाया है। शायद यही कारण है की अभी कौतुहल बाकी है, और आकर्षण बढता ही जा रहा है। देखे आगे मेरे अनुभव में क्या घटित होता है।
हरे कृष्ण !
शुक्रवार, मई 22, 2009
ज़िन्दगी रफ्तार से भाग रही हैं,
मगर वहम जिंदा हैं, आस भी जाग रही हैं।
हर दिन कई सुबह
हर सुबह को जागना,
ज़िन्दगी जागी हुई हैं,
अगली सुबह तक मानना,
हर दौर से मुश्किल,
यह दौर ज़िन्दगी का,
जब न 'मैं' हैं, न मेरेपन का अहसास,
बस भागना और भ्रम खुदी का |
राह पे सोना हैं राह पे सुबह भी,
राह से झगड़ना, राह से सुलह भी,
कहाँ जाना, कहाँ से चले,
नही समय अब औ न फिकर ही।
भाग रही हैं ज़िन्दगी,
बस भागती हैं ज़िन्दगी।
सुना था खुदा ने कोई ख्वाब बुना था,
दुनिया बनाने का इक मकसद रखा था,
इंसा भागता ताउम्र बेमकसद बेज़रूरत,
क्या यही खुदा ने किस्मत रचा था?
ज़िन्दगी के लिए, ज़िन्दगी से अलग ,
न खुदा, न खुदाई बस भागने की ललक ,
यह कहाँ जा रहा हैं ख्वाब खुदा का,
क्या खुदा से बड़ी हैं इन्सान की ललक?
चलो रुक चुका कुछ अधिक देर मैं,
न और सोंच सकता अधिक देर मैं,
भागना ही गर किस्मत अगर इस दौर,
चलो भाग कर देखूं कुछ और देर मैं।
मगर वहम जिंदा हैं, आस भी जाग रही हैं।
हर दिन कई सुबह
हर सुबह को जागना,
ज़िन्दगी जागी हुई हैं,
अगली सुबह तक मानना,
हर दौर से मुश्किल,
यह दौर ज़िन्दगी का,
जब न 'मैं' हैं, न मेरेपन का अहसास,
बस भागना और भ्रम खुदी का |
राह पे सोना हैं राह पे सुबह भी,
राह से झगड़ना, राह से सुलह भी,
कहाँ जाना, कहाँ से चले,
नही समय अब औ न फिकर ही।
भाग रही हैं ज़िन्दगी,
बस भागती हैं ज़िन्दगी।
सुना था खुदा ने कोई ख्वाब बुना था,
दुनिया बनाने का इक मकसद रखा था,
इंसा भागता ताउम्र बेमकसद बेज़रूरत,
क्या यही खुदा ने किस्मत रचा था?
ज़िन्दगी के लिए, ज़िन्दगी से अलग ,
न खुदा, न खुदाई बस भागने की ललक ,
यह कहाँ जा रहा हैं ख्वाब खुदा का,
क्या खुदा से बड़ी हैं इन्सान की ललक?
चलो रुक चुका कुछ अधिक देर मैं,
न और सोंच सकता अधिक देर मैं,
भागना ही गर किस्मत अगर इस दौर,
चलो भाग कर देखूं कुछ और देर मैं।
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