रविवार, अगस्त 17, 2008
शायद यही कारण है, दुनिया की श्रेष्ठतम कृतियाँ तूफानों के बाद लिखी गई हैं। अब तूफ़ान चाहे दिखे या न दिखे। चाहे वह बाहर से भीतर आया हो, जैसे राजनितिक परिवर्तनें, (कार्ल मार्क्स, रूसो) या भीतर ही उपजा हो, (तुलसी, सूर)।
भारतीये इतिहास भीतर की गतिविधियों का है। अभी भी भारतीये मानस राजनीती से उतना नहीं डोलता जितना अन्तर के किसी तार से , अब चाहे वह सास-बहु चिट्ठों से आया हो या फिर आसाराम बापू से। भारतीये मानस भीतर से बाहर तरफ़ जीने का प्रयास है। पाश्चात्य चिंतन बाहर को पकड़ने की कोशिश। बाहर के इलेक्ट्रानिक्स को पकड़ा आपने, भीतर के इलेक्ट्रानिक्स से जोड़ा हमने। आपने मोबाइल बनाये और हम घंटों उसपर अपने दोस्त से बतियाये। अब आप मोबाइल बना सकते हैं, दोस्त नहीं। और हमें दोस्त बनाना आता था इसलिए मोबाइल बनाने में समय नहीं लगाया।
मगर आपका मोबाइल काम कर गया, और हमारे सब दोस्त मोबाइल ho gaye । आपका मोबाइल हमारी दोस्ती पर हावी हो गया। आपकी हर तकनीक कामयाब हो गई। बाहर की चकाचौंध से हम भीतर की खोज भूल गए, और इसलिए शब्दों की कमी पड़ गयी। कहें भी तो क्या कहें? शब्दों की भी kadra होनी चाहिए। अब यहाँ का समाचार wahan udel देना यह bahari बात थी। और paschat जगत में यह ज़रूरी है। जैसे पाश्चात्य जगत की एक देन है vigyan। यहाँ आप अपनी बात नहीं कह सकते। apke अन्तर जगत से कोई लेना देना नहीं है। आपको वही kahna पड़ेगा जो adhikansh लोग कह रहे हैं। yane बाहर से भीतर की तरफ़। आप अपने abhivyakti में swatantra नहीं हैं। Lie detector kahega की कोई झूठ बोल रहा है की नहीं। अपने दिल की बात मत poochiye।
तो ऐसे में शब्दों की कमी lazimi है। आदमी dara हुआ है की kahin उसके शब्द sarak पर pahchan न लिए जायें। की kahin वह chaurahe पर apne shabdon ki अलग shakhsiyat से अलग sa न दिखे।
sahas को अब bewakoofi कहते हैं और zindagi को machini ही jina उचित है। तो शब्द कहाँ से आए। केवल vicharon का कट paste हो सकता है। और वह तो केवल puravartan होगा, vistar नहीं।
शनिवार, जून 14, 2008
कवि और कविता
बहुत चाहा,
कि मेरी कोई कविता मेरी ही रहे
कि मेरा अपनापन कायम रहे उससे, लिखे जाने के बाद भी ।
मगर हर बार मेरे सामने वह कागज पे जा चिपकती है
और फिर वह मेरी अपनी कभी नही लगती है।
कोई फर्क नहीं ढ़ूंढ़ पाता हूँ मैं,
मेरी कविता और किसी अन्य की रचना में
कोई साम्य नही मिलता मुझे 'मैं' और मेरे शब्दों में
वह कविता जो सादे पन्नों पे बिखर जाती है,
मेरी ही शक्ल में कुछ देर नज़र आती है,
फिर वह सामान्य लगती हैं ।
कोई सम्बन्ध नही जोड़ पाता मैं उसके उस कागज पर पहुँचने के बाद।
जैसे मेरा उससे कोई रिश्ता ही न हो।
और वह कविता भटकती है अपनी ही रूह पा,
न जाने कहाँ कहाँ पहुँचती है, अपनी ही कदमों से ।
नही देखा था उसके पैरों को मैंने जब उसे सहेज कर
धीरे से नर्म कागज़ के सफ़ेद बिछोने पे रखा था।
बहुत देर तक निहारता रहा उसके सौंदर्य को ।
और अचानक किसी ने 'वाह' की,
कविता कुनमुनाई,
पैर पटके।
आह, वाह के फिर दौर आ निकले ,
कविता के पैर चले।
कहाँ कहाँ नही गयी,
कविता अपनी ,
वह दौड़ गयी,
ख़ुद ही मंजिलें अपनी ।
बस वह कविता नही रही
कविता अपनी ।
मैं बेबस ,
कुछ उत्साहित,
देर तक ,
कुछ दूर तक
उसे देखता रहा।
सच अब उस कविता में मेरा
अपना कुछ भी नही रहा।
आज मैंने जाना
मेरी मां ने भी देखा था ,
यूं ही दूर तक जाते हुए मुझे ,
जैसे कोई कविता निकली हो उसके दर से ।
उसकी कविता को पैर हुए
एक अरसा हो चला हैं,
उस कविता ने हर कहीं कदम रखा है,
मंचो पे जब भी वो चढ़ा है,
आह वाह ही मिला है।
आज कद्रदां कविता को ढ़ूंढ़ते हैं,
कवि की तलाश कौन करता है इधर।
न दस्तूर हैं निगाहे मंच का,
की कविता कवि की गुलाम रहे।
इस दौड़ में कवि बेमतलब है,
काफी है कि बस कविता की पहचान रहे ।
बचपन में कितने ही कवियों की कवितायें,
मैंने यूं ही पढ़ सुनाये,
स्कूल के मंच से ।
वाह वाह के लोभ में,
कविता बहुत आगे निकल आयी,
कवि कही पीछे रह गया,
कोई कविता अब कवि का हिस्सा नही ,
हर कविता ख़ुद कवि हो गया।
बुधवार, जून 11, 2008
मंगलवार, जून 10, 2008
सोमवार, जून 09, 2008
रविवार, जून 08, 2008
खाली पन्ने बिना खालीपन के
सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद एक शून्य बचता है जो आरंभ के पहले से ज्यादा खाली लगता है ।
जैसे हर कविता अपने पीछे एक सादा पन्ना छोड़ जाती है । शब्दों के बहाव के बाद फिर से रेत की परतें दिखाई देती हैं। उस रेत पे बहाव के चिन्ह, उभार और लकीरें शब्दों के गुज़र जाने का अहसास भी दिलाती हैं और उसके बाद की खामोशी अधिक खाली लगती है ।
उसके आने के पहले कुछ था नही । मगर उसके नही होने का अहसास भी तो नही था। भूमि उर्वर थी मगर उसे एक वृक्ष की आवश्यकता नही थी । कहीं से किसी पक्षी ने एक बीज डाल दिया । भूमि तो उर्वर थी ही , उस बीज में संभावनाएं भी थीं। सो वृक्ष बनते देर नही लगी। एक दिन एक आंधी आयी और उस वृक्ष को झुकना नही आया। उसे अपने उर्वर भूमिं का भरोसा था । आंधी किसी को कहाँ पहचानती है। और गर चट्टानों को कही वृक्ष ने अपनी जड़ों से जकड़ा होता तो सम्भावना भी थी। यहाँ तो ज़मीं उसके प्रेम से नम थी। सो आंधी उस वृक्ष को उड़ा ले गयी। अब वह भूमि सुनसान लगती है। वृक्ष था नही। किसी को अहसास भी नही था की एक वृक्ष हो सकता है यहाँ पर। मगर वहाँ एक वृक्ष पनपा और अब सब कहते हैं, यह जगह खाली लगती है।
कुछ लोग अब इस दुनिया में नही रहे । वे नही थे तो कमी नही थी ... मगर अब उनके बिना सब सुना लगता है। क्या हमारे नही होने का अहसास भी इतना ही गहरा होगा? तो होने का क्या अर्थ था? क्या हमारा होना इसलिए ही था की हमारे न होने पे एक जगह खाली दिखे?
कबीर कहते हैं...
दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया ।
माने वृक्ष के न होने का अहसास न हो । माने कविता जब लिखी जाए तो उसके गुजर जाने पे कोई खालीपन न आए। कोई सादा पन्ना न हो जो कविता के लिखे जाने से पहले से ज्यादा सादा लगे।
जैसे आने वाली सदियाँ, हमारे उपयोग किए प्लास्टिक को अपना सरदर्द न माने। हमारे द्वारा सारी धरती को कंक्रीट से पटा देख उन्हें अपनी संभावनाएं कम न लगे। की उनके पास भी हो एक उर्वर भूमि मगर जिसपे दाग न हो अपने पहले गुज़र गए किसी वृक्ष की याद का। कविता के बाद का पन्ना खाली तो हो मगर पहले से ज्यादा नही।
शुक्रवार, जून 06, 2008
जीवन का वृत्त
आज शाम अचानक घने बादल आए । फिर झमाझम बूंदें धरती की ओर दौड़ पड़ीं। जैसे स्कूल से लौटते बच्चे अपनी माँ की ओर दौड़ते हैं, लिपट जाते हैं । वे बच्चे जैसे अपने सारे अस्तित्व को, जिससे उन्होंने दिन भर सब शैतानियाँ की हों उसे मिटा देना चाहते हों। और अपनी माँ के स्वच्छ धवल साड़ी के पल्लू में अपने स्व को खो देना चाहते हों।
जीवन का वृत्त पूरा होता है । सुबह की टाटा से शाम के लौटने तक ।
जैसे बादल लौटते हैं धरती पे।
सूरज की चमक से चकाचौंध धरती की बूंदें सूरज की चाह में, उसकी लालसा से वाष्प बन जाती हैं। और अपने प्रियतम को छोड़ ऊपर उठती हैं।
धरती हमेशा नीचे है। प्रेम हमेशा नीचे उतर कर मिलता है। आदमी की चाहतें उसे ऊपर उठने को प्रेरित करती हैं। उसे स्वप्निल बनाती हैं । वह उस अन्बूझ को पाने के लिए प्रेरित हो उठता है जिसकी केवल चमक उसने देखी है। बूंदें भी ऊपर उठती हैं ।
गर्द की परतों पे बैठ बादल बन जाती है । गर्द उसे बैठने की जगह भी देती है और सूरज तक की उड़ान से थकी उसकी चाहतों को विश्राम भी ।
गर्द धरती का ही हिस्सा है , जैसे वह बूंद जो सूरज की चाह में वाष्प बनी थी।
गर्द भी हवा से प्रीत कर बैठा और उड़ा था हवा बनने के लिए।
तो उस बूँद को गर्द मिल गया। गर्द से उसे धरती की याद आई । अपने आराम का ख्याल रखने वाली धरती। जिसने सब कुछ धारण किया था। उसे तब से सहेजा था जब वह लोगों की आंखो से दूर एक नन्ही सी बूँद थी। दूब पर सिमटी हुई। उसने उसे अपने अन्तर के प्रेम के तालाब का हिस्सा बनाया था। आज फिर से उस बूँद को अपनी धरती की याद आई । धरती भी बूँद बिन जल रही थी। अपने अधूरेपन को, बूँद के बिना अपने अस्तित्व को कोस रही थी।
तभी धरती की याद से संघनित, वाष्प से बूँद बन, वह धरती का हिस्सा धरती से मिलने लौट आया। धमाधम , दौड़ते हुए, जैसे बच्चे लौटते है माँ के पास स्कूल के बाद।
खूब बारिश हुई और कुछ बूँदें हमारी आंखों से भी निकल पड़ी । क्या मिलन था । लौटने का सफर ही तो सफर होता है। जैसे बूंदे जब धरती पर लौटती हैं तो कई आंखे उसे निहारती हैं। बच्चे खुशी नाचते हैं। कोई गीत बनता है।
आज खूब बारिश हुई । और मेरा अन्तर भी गहरे भींग गया।
जीवन का वृत्त पूरा होता है।
जो जहाँ से चला उसे वहाँ लौटना होता है। नही की यह मजबूरी है, मगर यह ज़रूरत है अस्तित्व के लिए।
आत्मा का परमात्मा की तरफ़।
पिता से पुनः पिता बनने तक। जब पिता की सबसे अधिक याद आती है।
अलग होने के बाद पुनः झगड़ने के लिए उस नुक्ताची की तरफ़ ।
उन्ही बादलों को देख मेरा मन भी लौटता है ।
अपने अन्तर में। कुछ खोया ढ़ूँढ़ने को।
लौटने के सफर में बारिश तो होती है।
बुधवार, जून 04, 2008
राम के द्वार तक
सोचा कीमत कम देनी होगी।
छोटे से जीवन की,
थोड़ी खुशियाँ गिरवी होंगी।
दुनिया के बाज़ार का,
मगर हाल बहुत बुरा निकला।
मेरे सारे जीवन की कीमत,
मेरी खुशिओं से कम निकला।
बहुत दुकान भटकने पे,
मेरा एक कद्रदां निकला।
वादे किए , गले लगाया,
फिर फरेब का यार निकला।
भोली सी नज़र जब उसकी,
इतनी शातिर हो सकती है।
और दुकानें क्या ढूंढ़ना
उनकी ख्वाहिश क्या कम होगी?
सोचता हूँ क्यों सपने देखूं,
अपनी खुशियाँ क्यों कर बेचूं ।
राम द्वारे, हो मतवाले,
प्रेम करूं और अर्पित कर दूँ।
सोमवार, जून 02, 2008
कौन साकी है
फिक्र है खुदा ने पूछा तो क्या कहूँगा, कि कौन साकी है ।
पिलाया है मद में चूर जिसने इस नशे मन से रूह तलक,
वो फरिश्ता है, मुहम्मद या क़यामत, या केवल साकी है?
बुधवार, मई 28, 2008
मकसदों के मयकद
कुछ पिए, कुछ गिरे, नज़र सवाली लिए,
कुछ याद उनकी, कुछ जानिबे मंजिल की फिकर,
ज़िंदगी की उलझनों में बेहोश हम बेमानी जिए।
उनके याद की मदहोशी जुनुने -इश्क के लिए,
क्या बात अच्छी है खुदा इस रूह के लिए?
राह की चाह में हर कदम पे किए सवाल जो,
ज़िंदगी के मकसद को वे कुछ खाली-खाली किए,
आसमां की चाह में ज़मीं को रौंदते हुए,
मकसदों की भीड़ ने मयकदों पे तानाशाही किए,
आज हम बेचैन हैं फिर से आसमां के लिए,
क्या कोई राह है इस ज़मीं पे आसमां के लिए?
ज़मीं की ही पैदाइश हैं, ज़मीं पे मर गुज़रना है,
मगर हर शख्स है बेचैन यहाँ आसमां के लिए ।
बनाया क्यों खुदाया ने इन गुल गुलिस्तों को ,
गर ज़मीं थी बस राह भर आसमां तक के लिए?
यादों की अंगराई
कोई दर्द धीमा सा , अन्तर की कोई लड़ाई बाकी है ।
सामने सितारों का मंजर , भीतर अंधेरे की गहराई बाकी है,
चहकते होठों और ठहाकों के बीच गहरे कही रुलाई बाकी है ।
वो अभी तक जो लौट नही पाई, घाटी की उस गूंज की शहनाई बाकी है,
रमा ले जिंदगी को बेमकसद चाहों में , वो रुसवाई बाकी है।
शनिवार, अप्रैल 12, 2008
सतत चाह राह की
सुबह की अंगराई में न मैं हूँ , न याद ही।
भटकती हुई रात में सब कुछ खो गया है,
यादों के बीतने से एक नया सवेरा हुआ है,
श्वेत दिन का पटल है, नयी स्याह चाह की,
फिर से उल्झेंगी लकीरें याद की ।
कोई रात कहीं होगी फिर आगे राह में,
फिर से बेचैन करवटें सुबह की चाह में ।
अनवरत राह चाह की ,
शामें श्याम स्याह की।
फिर धवल सुबह की राह भी,
सतत चाह राह की।
कर्तव्य और विज्ञान
कुछ महीनों पहले लिखे अपने ही ब्लॉग की कुछ पंक्तियाँ आज के अनुभव को अभिव्यक्त करने में सहयोगी प्रतीत होती है।
"सत्य और प्रेम के बीच में झूलते मन के लिए , ठीक अर्जुन की तरह , कर्तव्य का निराव्लाम्ब ज्ञान चाहिये। कर्तव्य के अभाव में न व्यक्ति प्रेम में टिक पता है और न सत्ये में। वह दोनो के बीच झूलता हुआ शरीर और समय दोनो गुजार देता है। और जाते जाते एक ऐसा समाज छोड़ जाता है जिसे आने वाले लोग न त्याग पाते है न सुधार पाते है।
तो सत्य की अपनी समस्याएं है और प्रेम की भी । यह समस्या तब वीभत्स हो जाती है जब सत्य का अन्वेषक प्रेम की दहलीज पर पहुँचता है। और कर्तव्य के ज्ञान के अभाव में जीवन के अर्थ को अनर्थ करता हुआ समाज और परंपरा की दुहाई देता दिखाई देता है।"
भारतीये समाज और परम्पराओं के मूल में जो जीवन दर्शन है वह बार बार मुझे ऊपर अभिव्यक्त समस्याओं के उत्तर की व्याख्या दिखाई देती है। जीवन और जीवन के अर्थों जैसे, संबंधों, मूल्यों इत्यादी के प्रति सजग होने के प्रयास में व्यक्ति अक्सर प्रेम, सत्य और कर्तव्य से जूझता दिखाई देता है। कर्तव्य की ही दूसरी व्याख्या वेद 'धर्म'शब्द से देते है । जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि धर्माचरण बता कर वेद कर्तव्यपरयणता को ही प्रधान देते दृष्टिगोचर होते है। क्योंकि 'धर्मं शब्द का प्रायोगिक औचित्य कर्तव्य के अर्थ में ही परिलाक्षिता होता है। जैसे हम कटे है ... ' मेरा धर्मं यह नही है', मैं धर्मं संकट में फँस गया हूँ ' ..इत्यादी ।
शास्त्रों द्वारा निर्धारित धर्मं की परिभाषा को न जीवन के उद्देश्ये के सम्बन्ध से अथवा उनके द्वारा निर्गत धर्म रूपी कर्तव्यों को ही विज्ञान जीवन या सृष्टी का उद्देश्य मनाने को तैयार है। प्रेम विज्ञान की समस्या नही है। वह इसे नही समझ सका है और न ही इसमे अपनी उर्जा देने को तैयार है। कर्तव्य का निर्धारण विज्ञान 'system' के 'functional' रहने के संदर्भ में करता है। जब तक एक संस्था कार्य करने में समर्थ है, विज्ञान उसे सफल मानता है। 'cosystem' के संदर्भ में भी जब तक वह कार्य करता प्रतीत होता है , विज्ञान उसे 'मेम्बेर्स' के कर्तव्यों का अन्वेषण करने को टायर नही होता है। वह मानता है की प्रकृति स्वतः जिम्मेवार है सभी कार्यों के लिए और प्रकृति उसके लाभान्वित होने वालों को अकारण वह लाभ दे रही है। यदि प्रकृति में कोई विकार आता है तो उन कारणों को खोजने में उर्जा तो लगाई जा सकती है, उन कर्तव्यों की पुनः व्योख्या की जा सकती है जिनके पूरा न होने से प्रकृति रूपी 'system' में विकार आया है। जैसे जब तक 'ग्रीन होउस इफ्फेक्ट' न हो जाए तब तक यह जानने की संभावना नही है की अभी तक ग्रीन होउस क्यों नही हुआ। सत्य के अन्वेषण के प्रति विज्ञान की प्रतिबधता पर संदेह नही किया जा सकता। किंतु उस सत्य के उपयोग पर परसना चिह्न जरूर लगाया जा सकता है जो जीवन मूल्यों को कर्तव्यों के आधार पर रेखांकित न कर सके। ऐसे कर्तव्य जो सत्य के अनुसंधान से और प्रेम के प्रकाश में जीवन को अधिकाधिक आनंदित और सृष्टी को अधिकाधिक जीवन योग्य बनाने में सक्षम हों विज्ञान अपनी पद्धति के कारण नही कर पाता । अब सवाल यह है की यदि सत्य का अन्वेषण जीवन को सम्रिधा और आनंदित करने मैं असफल हो तो ऐसे सत्य का अनुसंधान मानव मस्तिस्क की एक अंहकार को पूरित करने का बचकाना प्रयास भर नही है?
गुरुवार, फ़रवरी 28, 2008
The bhakta who prefers solitude is the best.
Why shouldn't he go about telling others of the benefits of bhakti ?
The one who pervades all, needs none for his help. And he choses the one, anyone he wants to make as means to his end. The attempt to 'do', to act, as if one is independent of 'Him' goes against the premise of bhakti itself. If he wishes, that wish doesn't require a 'wll' of one's own and in the surrenderd self,what happens is a joy of existence. It is not aimed at anything, no goals, no reasons for action, just a joy of defining oneself in the act of action as a self who is surrenderd to 'Him'.
In duality, in the presence of the other, any other human being, not in physicality but in the impression on the senses, the core of all, the mind, acts so as to define onself in relation to the other present. And often creates demarcations in negation or acceptance to the others characteristics. Like, one being a male in front of a female, one being a good sadhak in response to a bad person etc. But this defining of the self is also creting the self and an ego which forbids surrender. Solitude, is thus essential. For one needs none in order to be with the 'One'.
And that bhakta is the best who seeks none. Seeks nothing. Exactly in reverbration of "Sarvadharmparityajya" ... Gita , Leaving every sense of an action originating from the self. Helives with him and is bothered about nothing and cares for nothing. A true lover mad in the joy of remembrance of his beloved !
Hare Krishna!
सोमवार, फ़रवरी 11, 2008
सिमटते मकसद
दृष्टि का वितान कुछ घटने लगा
नज़र थी क्षितिज तक फैली हरियाली
दामन के काँटों में खोने लगा
कभी हंसी की रुसवाई, कभी रुसवाई की हंसी
चाँद तारों का मकसद खोने लगा
वो नदी का चहकना, हवा का बौराना
बेमानी सारा मंज़र लगने लगा
अभी भी फ़क्त सुनहला एक आँचल
झुकी सी नज़र, भिंगा सा काजल
छिटकी एक हंसी , रुप हँसता हुआ
जिंदगी का मकसद कुछ सिमटता हुआ
सोमवार, जनवरी 21, 2008
ज़माने से अलग
उठते निगाहों ने सवाल कर दिए।
कुछ सवाल हम से किये कुछ सवाल खुद को दिए,
कोई सवाल न उठा जिंदगी के मकसद के लिए।
की हम भी कोई हैसियत है खुद में ,
न ज़िंदगी है दूसरो के तजुर्बों की हद में ।
जीये ही क्या जो ज़िंदगी न हो अपनी,
दूसरो के इरादों में हों पूरी साँसे अपनी।
निगाहें उठीं, कुछ आहें उठीं ,
उपहासों के साथ ठहाके उठीं।
न उठीं तो बस उनकी गिरी नज़र न उठीं,
जिनके गिरने से हमारी मंजिल उठीं।
अभी भी सही है बस नज़र अपनी,
सबकी बदली बस न नज़र अपनी।
अभी भी उठती है उसी इज्ज़त से,
खुद को परखती है नज़र अपनी।
गुरुवार, जनवरी 17, 2008
Space time continnum and universal conscioueness
Isn't it same as the concept of gravitation given in the general theory of relativity? where we can say the Black hole is the person who has got realised and has developed the infinite capacity to take away others "पाप" or sins. If we treat individuals as the residents on the continuum of consciousness which is also the continuum of space time, consciousness being the missing element in the "theory of everything", being partners with Maxwell's electrical and magnetic fields and Einstein's gravitation and time, we get a picture of a sheet of infinite dimensions on which one's present reality sits. If one wants to move away from this reality, the tension created by him/her is also a force acting upon the nearby individuals, specially to those who have stronger karmic bondages. The state of the sheet is thus collectively decided and so the universal consciousness decided the fate of the future of the sheet of world reality. This may thus also be seen as the Yuga being created by mutual agreement of the inhabitants at some plane.
And if we collectively decide to lift up or change the course of the future predicted or programmed by an architect (read God) in the language of Philosophy of Matrix, the Movie, with the help of say an Oracle (Read a saint who understands the law of creation, then some neo can make some sacrifices by originating a systemic belief permeating the entire consciousness, the architect will be forced to say in the end " why are you prolonging the inevitable!" (From Matrix Revolutions, last scene). Though in my opinion the actual God will only be happy instead of perplexed at the achievement of it's creation !
Hare krishna!
गुरुवार, जनवरी 10, 2008
सत्य की समस्याएं प्रेम की दहलीज पर
संसार का सत्य क्या है? और उस सत्य का आधार क्या है? यह भारतीय दर्शन शास्त्रों का प्रधान विषय रहा है। हेय , हेय हेतु , हान और हानोपाय । यानी दुःख , दुःख का कारण, दुःख न होने की स्थिति और उस स्थिति को पाने का उपाय । और बार बार , शंकराचार्य से लेकर पतंजलि ऋषि तक ने अज्ञान को ही दुःख का कारण माना है। अज्ञान माने सत्य का ज्ञान न होना। तब सत्य के ज्ञान से दुःख की निवृत्ति संभव दिखती है।
तब सत्य क्या है? वेद कहते है "एकम् सद् विप्र बहुधा वदन्ति" एक ही सत्य है, उसे विद्वान लोग विभिन्न प्रकार से कहते है। और वह सत्य क्या है? " सर्वं खल्विदम ब्रह्म " दृश्य -अदृश्य सभी ब्रह्म है। "जगद मिथ्या" यह संसार मिथ्या है। अर्थात् जीवन का सबकुछ अन्तवान है , नश्वर है। इसमें कोई अर्थ नही है।
अब सत्य हमने जान लिया। तो सारी समस्याएं समाप्त हो जानी चाहिये! क्या जिन समस्यायों के साथ हमने सत्य की तलाश शुरू की थी वह समाप्त हो गयीं? नही न। मतलब सत्य से समस्याएं नही सुलझती । उलटे सत्य की अपनी समस्याएं होती है। जैसे संसार ke मिथ्या होने के सत्य के साथ यह समस्या है कि जीवन का अर्थ खो जाता है। मेरे जीवन का सारा प्रेम बेमानी हो जाता है। और जीवन जैसे ही प्रेमशून्य हुआ फिर जीवन ही नही रह जाता है।
अब हमारे अनुभव से यदि प्रेम का होना ही जीवन की वास्तविकता है और परें से अपूर्णता ही जीवन का मिटना है, तो फिर प्रेम और सत्य का संबंध समझना होगा। तभी सत्य की समस्यायों से निजात पाया जा सकता है। और प्रेम के आधार को समझा जा सकता है। कुछ लोग यूं भी कह सकते है कि प्रेम के आधार को, प्रेम के सत्य को जानने की आवश्यकता क्यों है? और ऐसे लोगों की तादाद बड़ी है। जीवन के द्वन्दों के बीच , सत्य और प्रेम के बीच, दिन की वैचारिकता और रात्रि की भावनात्मकता के बीच, चिंतन और आवेशों के बीच जीवन को झूलते हुए , एक छोर से दूसरे की ओर निरंतर गुजरते हुए गुजरना चाहते है। क्योंकि इसमें एक मदहोशी है, खुद को भूले रहने का एक नशीला अहसास है जिसे मन छोड़ना नही चाहता। इन अनुभवों के बीच से यदि मन कभी किसी का ऊपर उठे और इन थापेरों के सत्य को समझने का प्रयास करे तो वह कृष्ण के कहे "स्थित्प्रग्यता" को प्राप्त कर सकता है जिसके अभाव में अर्जुन को अपने कर्त्तव्य कर्म का अज्ञान हुआ था। और आज न प्रेम की कमी दिख रही है, न सत्य की । हर व्यक्ति किसी न किसी से प्रेम करता हुआ दिख रहा है। सिनेमा घरों में तो प्रेम की बाद दिखाई दे रही है। और यदि कला को समाज का आईना माने तो समाज में भी प्रेम जरूर है। सत्य की तो बात ही क्या है। स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक सत्य बेधर्ल्ले से बँटा जा रहा है। लोग अब अपने बारे में पहले से ज्यादा सत्य जानते है। उनकी किडनी कितनी ठीक है, उनका ब्लड प्रेशर कैसा है... वगैरह। पहले ऐसा कभी नही था। लोग अज्ञान में सारी जिंदगी जी लेते थे, उनके शरीर में एक किडनी भी है और उनका ब्लड प्रेशर किस है नहीं जान पाते थे। अब हम अपने बारे में ज्यादा सत्य जानते है। और हम ज्यादा प्रेम भी करते है। हमारे माँ बाप ने कभी एक दुसरे से "आई लोवे यू" नही कहा था। हम रोज कहते है , किसी न किसी से। तो प्रेम भी ज्यादा है और सत्य भी ज्यादा है। बस कर्तव्य परायणता नही है॥ क्योंकि स्थित प्रज्ञता नही है... अर्जुन को कोई कृष्ण नही मिलते । और न जरूरत महसूस होती है।
सत्य और प्रेम के बीच में झूलते मन के लिए , ठीक अर्जुन की तरह , कर्तव्य का निराव्लाम्ब ज्ञान चाहिये। कर्तव्य के अभाव में न व्यक्ति प्रेम में टिक पता है और न सत्ये में। वह दोनो के बीच झूलता हुआ शरीर और समय दोनो गुजार देता है। और जाते जाते एक ऐसा समाज छोड़ जाता है जिसे आने वाले लोग न त्याग पाते है न सुधार पाते है।
तो सत्य की अपनी समस्याएं है और प्रेम की भी । यह समस्या तब वीभत्स हो जाती है जब सत्य का अन्वेषक प्रेम की दहलीज पर पहुँचता है। और कर्तव्य के ज्ञान के अभाव में जीवन के अर्थ को अनर्थ करता हुआ समाज और परंपरा की दुहाई देता दिखाई देता है।
"गहना कर्मणो गतिः " कृष्ण गीता में कहते है। इस कर्तव्य को समझना गहन है। कठिन है। और यह समझने के लिए कृष्ण के पास ही जाना होगा।
हरे कृष्ण॥ हरे कृष्ण ॥ कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥
रविवार, जनवरी 06, 2008
compassion to anger
- Does it serve?
- why does senses ask us to get angry?
- is it programmed in us?
- at what level does it serve a purpose?
At animal level we see that anger has a purpose it takes the adrenalin and prepares the body to a level that we deliver our best. And one of the most often portrayed emotions in arts, movies, plays is the emotion of anger. At human level too it takes us to the basic nature of attack when some wish of ours is not on the path of being fulfilled. And it apparently solves the problem.. it creates an illusion of problem being solved due to the outburst. The pressure inside is released... so there is a relief.
Now lets go back to situation that led to the anger. We desired... and it did not happen... but why? our karmic cycle did not permit it! thats how we explain things in life. The things that our karmas deserve comes to us. So when we did not deserve but had the want for it, it did not come. Can it come to us by the action of anger? yes it can ... if we are ready to pay in terms of our punyas... so Rishis used to give shaap to people who did not behave in a way acceptable to them. As a result of which they used to loose punya and had to go to do tapasya again! So we are losers when we get angry. Now what if we do not have enough Punya... then we are losers all the way! Waisting punya in the spiritual world and the losing confidence of people in the material world.
So a naive brain would react in anger which a sophisticated one would not. Though the intent of the person may remain unclear and possibly account to a later accumulated outburst or may be subside through cogitation and realigning of the thoughts.
But is anger bad to the material world? Once a mahatma replied to a pupil that anger of knowledgeable does good to the society and that of a fool creates nuisance.
शुक्रवार, जनवरी 04, 2008
living without identity
This effort also consumes energy and is a source of constant disappointment for all our definitions are forever changing.Our existence is dynamically defined but our intellect seeks a permanent identity. Something that we can hold on to. We are 'sons', 'friends', 'citizens', 'Lovers', 'tax payers', 'nuisance creators', 'fathers', and so on... the definitions are changing every moment but we have a need to have a solid and reliable definition which is likable in our own vision... say for instance we want to be a 'lover' but may be we do not want to be 'a tax payer' or a 'father'. These reluctance offer resistance to the dynamicity of the otherwise fluid and fuzzy creation.
Can we live without identities? not bothering about who I am but doing what the time demands! Like a saint. You ask him who he is and he has no fixed answer to it. You ask Hanuman and he says he is a servant of lord 'Ram' ... he is choosing to define himself with respect to something constant! Well that would be difficult for all! Hare krishna !
