बुधवार, मई 28, 2008

मकसदों के मयकद

मकसदों के मयकदों में अधूरी प्याली लिए ,
कुछ पिए, कुछ गिरे, नज़र सवाली लिए,
कुछ याद उनकी, कुछ जानिबे मंजिल की फिकर,
ज़िंदगी की उलझनों में बेहोश हम बेमानी जिए।

उनके याद की मदहोशी जुनुने -इश्क के लिए,
क्या बात अच्छी है खुदा इस रूह के लिए?
राह की चाह में हर कदम पे किए सवाल जो,
ज़िंदगी के मकसद को वे कुछ खाली-खाली किए,

आसमां की चाह में ज़मीं को रौंदते हुए,
मकसदों की भीड़ ने मयकदों पे तानाशाही किए,
आज हम बेचैन हैं फिर से आसमां के लिए,
क्या कोई राह है इस ज़मीं पे आसमां के लिए?

ज़मीं की ही पैदाइश हैं, ज़मीं पे मर गुज़रना है,
मगर हर शख्स है बेचैन यहाँ आसमां के लिए ।
बनाया क्यों खुदाया ने इन गुल गुलिस्तों को ,
गर ज़मीं थी बस राह भर आसमां तक के लिए?




यादों की अंगराई

कि अब भी यादों में कोई अंगराई बाकी है,
कोई दर्द धीमा सा , अन्तर की कोई लड़ाई बाकी है ।

सामने सितारों का मंजर , भीतर अंधेरे की गहराई बाकी है,
चहकते होठों और ठहाकों के बीच गहरे कही रुलाई बाकी है ।

वो अभी तक जो लौट नही पाई, घाटी की उस गूंज की शहनाई बाकी है,
रमा ले जिंदगी को बेमकसद चाहों में , वो रुसवाई बाकी है।