कि अब भी यादों में कोई अंगराई बाकी है,
कोई दर्द धीमा सा , अन्तर की कोई लड़ाई बाकी है ।
सामने सितारों का मंजर , भीतर अंधेरे की गहराई बाकी है,
चहकते होठों और ठहाकों के बीच गहरे कही रुलाई बाकी है ।
वो अभी तक जो लौट नही पाई, घाटी की उस गूंज की शहनाई बाकी है,
रमा ले जिंदगी को बेमकसद चाहों में , वो रुसवाई बाकी है।
बुधवार, मई 28, 2008
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1 टिप्पणी:
स्वागत है, नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.
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