संस्कृति प्रवाह है। यह बात सर्व विदित है।
नदियों की तरह, इसमें भी समय समय पर नयी विचार- धारायें मिलती रहती हैं ।
पर क्या धाराओं के साथ साथ नदी का स्रोत भी बदलता है? और क्या स्रोत के सूख जाने पर नदी की पह्चान वही रहती है? यदि नही, तो नदी की हर मोड़ को अपने स्रोत का ध्यान रखना होगा, अपनी पहचान के लिए और उससे कहीं अधिक अपने अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता में।
भारतीये संस्कृति में भी कई प्रवाह जुड़े हैं। मगर क्या उससे उसके उदगम का कोई महत्व नही रह जाता? क्या वर्त्तमान को सींचने वाली शाखाओं में अब भी सबसे अधिक योगदान उसके अतीत का ही नही है? तो प्रश्न उठता है- अपने स्रोत पर चिंतन आज युवा मन क्यों नही कर पा रहा? कहीं बाद में जुड़ने वाली धाराओं ने अपनी मूल शाखा के प्रति इतनी घृणा तो नही पैदा कर दी की वर्त्तमान अपने आधार को ही भूल रहा है?
यह बात ज़रूर है कि तट का लाभ उठाने वालों में कोई ही भगीरथ होता है। किसी विशेष के मन में ही यह कौतुहल होता है नदी का स्रोत जानने की। असके भगीरथ को पहचानने की। और कोई विशेष लाभान्वित ह्रदय ही उस भगीरथ को सर नवाता है। यह विडम्बना तब बहुतायत होती है जब वर्त्तमान के पास विराम के क्षणों की कमी हो जाती है।
चिंतन अवकाश चाहती है। शरीर को सजीव रखने में ही जब संपूर्ण सामर्थ्य खर्च हो रहा हो तो स्रोत के चिंतन की उम्मीद नही की जा सकती। ऐसे में वर्त्तमान को क्षमा करना ही होगा। पर यदि वर्त्तमान मन की उच्छृंखलता में समय व्यतीत कर रहा हो तब स्रोत को उसे क्षमा नही करना चाहिए। भारतीये संस्कृति आधार रही है भारतीयों के वैश्विक स्तर पर मिली सफलताओं की । ऐसे में उस स्रोत पर चिंतन होना ही चाहिए।
इस संस्कृति ने सदियों आक्रान्ताओं को सहजता से सहा है। जो आक्रमण के पश्चात् लौटना नही चाहे उन्हें भी इसने आत्मसात किया है।
to be continued...
समय की कमी से अधूरा छोड़ना पड़ रहा है। जैसी कृष्ण की मर्ज़ी । हरे कृष्ण।
रविवार, जून 14, 2009
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