गुरुवार, अगस्त 27, 2009

एक सच्ची मुस्कान के प्रति

आज फिर मैंने किसी को मुस्कुराते देखा,
आज फिर मुझे डर लगा।

पिछली बार मैंने गलती की थी,
प्रतिउत्तर में मुस्कुरा दिया था,
और उम्मीद को जगह दे दी थी।
बाद में उन्होंने कहा था,
मैं तो ऐसे ही मुस्कुराया था।
कोई बुरी बात तो नही?
मैं कुछ कह नही पाया था।

क्योंकि मैं तब तक जानता नही था,
कि ऐसे ही मुस्कुराया जाता है,
मेरी समझ में मुस्कान एक अभिव्यक्ति थी,
व्यक्ति के अन्तर के स्थिति की,
मैं नही जानता था,
अब अभिव्यक्ति का स्थान नही है,
किसी भी व्यव्हार में।
अब अर्थ नही होता किसी भी मुस्कान में।

'ऐसे ही' मुस्कुराया जाता है,
'ऐसे ही' सम्बन्ध बनाया जाता है,
और 'ऐसे ही' ज़िन्दगी जी जाती है.

तो मैं सावधान था इस बार,
और उनकी मुस्कान,
पूरी कोशिश के बाद भी असफ़ल रही,
मेरी आंखों ने गहरे पीया उस मुस्कान को,
और एक खामोशी में घुला दिया।

बाद में उस मुस्कान ने कही गहरे जगह ले ली,
और मुझमे ग्लानी भर दी,
उत्तर के अभाव में,
उस मुस्कान ने मेरे व्यक्तित्व,
की नीव पर प्रहार किया,
और वह मुस्कान फिर सफल हुई।

मैं समझ सका,
क्यों बात उठती है सन्यास की।

सन्यास दर्द से पलायन नही है,
मुस्कानों से भागने का प्रयास है।
क्योंकि मुस्कान प्रतिउत्तर खोजती हैं,
और सम्बन्ध बनाती हैं,
बाहर में ।
भीतर गहरे ,
कही भी कुछ नही हो रहा होता है,
और मुस्कानें व्यर्थ ही समय बर्बाद करती हैं,
ज़िन्दगी को ऊपर ही ऊपर जीने में।

सब जहग आज मुस्कुराने का प्रयास है,
भीतर गहरे की अनभियक्ति को छुपाने का प्रयास है,
और यह मुस्कान सब जगह फ़ैल जाती है,
बिना किसी गहरे अस्तित्व के,
और समाज भरा दीखता है मुस्कुराते हुए,
बहुत से दुखी लोगों से।

सो मैंने सोचा है,
इस दुःख को अब और नही विस्तार द्दोंगा,
जहाँ तक होगा,
मुस्कानों को व्यर्थ फैलने से रोकूंगा।
जब तक एक कारण नही होगा,
एक सच्ची मुस्कान के लिए,
अबसे मुस्कानों का प्रतिउत्तर नही दूँगा।

1 टिप्पणी:

Aseem ने कहा…

शायद हमने ये दुनिया इसीलिए रची थी की इन नकली मुस्कानों को पहचान कर हमे असली मुस्कान का दोगुना सुख मिले ... लेकिन फिर भी जो नकली मुस्कानों के दलदल में ही फंस के रह जाते हैं .. उनके लिए क्या इसकी सज़ा उनके जुर्म से बहुत ज्यादा नहीं है ?