शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

मैंने उनमे डूबकर देखा है,
कुछ नहीं मिलता |
बस बेचैनी नहीं लगती,
तन्हाई नहीं खलता | 

2 टिप्‍पणियां:

Abhishek Ojha ने कहा…

कहाँ ? सदियों बाद दिख रहे हैं आप :)

Jyoti ने कहा…

हाँ, कभी दफ्तर कभी घर बार ही चिंता में खोया था,
अब भी नहीं जानता खोयी दुनिया थी या सिर्फ मैं खोया था. :)