सोचा था अधिक दिन प्रेम में गुज़रेंगे,
तमाशों के हाथ एक दिन और चढ़ गया।
ख़्वाहिश थी दिन समर्पण में जियेंगे,
विरोध के खाते एक दिन और बढ़ गया।
लाख समझाएं अपने दोस्त को हम,
हर बात से मिज़ाज और अकड़ गया।
कहाँ तक ढोयें रिश्तों को अकेले हम,
हर प्रयास से जज़्बात और बिगड़ गया।
ऐसा नहीं की कोई ऐब है दोस्त में मेरे,
बस नशा है ज़िन्दगी का जो सर चढ़ गया।
मौज की तलाश, फिर मौज से तलाश,
तलाश की मौज में, ठहराव बिखर गया।
अब भी सुकून की तलाश में सुकून खोया है,
क्या होगा सुकून का ग़र उम्र निकल गया।
अभी भी उम्मीद है समर्पण में ठहराव की,
इस क्षण के अर्थ और तलाश के अभाव की।
छोटी सी ज़िन्दगी में अगर थोड़े से ख्वाब हों ,
हर क्षण की महिमा हो, हर कण का हिसाब हो।
संभव है फिर प्रेम भी उतरे गहरे जीवन में,
समर्पण हो, प्रेम हो, न जज़्बातों का हिसाब हो ।
सहज ही तलाश फिर स्वमेव ही रुकेगी,
समय स्वयं ठहरेगा गर भीतर ठहराव बेहिसाब हो।
गर गहरे जीवन में सहज स्वरुप का ज्ञान हो ,
फिर कैसी तलाश हो किसका हिसाब हो।
फिर समझाए कौन किसे, हर समझ एक उलझाव है,
समझ की परिसीमा ही समझ का अभाव है।
यह कविता भी कुछ शब्द हैं बस मन का बहाव है,
कवि का ठहराव मौन है गहरा अप्रस्फुटित भाव है।
कवि की उदासी से कविता का प्रवाह है,
कवि की मौज गहरा मौन है ठहराओ है।
कब किस कवि ने खुद से मिलके कुछ लिखा हो,
हर कविता बेचैन है, कवि के भाव का अभाव है।
तमाशों के हाथ एक दिन और चढ़ गया।
ख़्वाहिश थी दिन समर्पण में जियेंगे,
विरोध के खाते एक दिन और बढ़ गया।
लाख समझाएं अपने दोस्त को हम,
हर बात से मिज़ाज और अकड़ गया।
कहाँ तक ढोयें रिश्तों को अकेले हम,
हर प्रयास से जज़्बात और बिगड़ गया।
ऐसा नहीं की कोई ऐब है दोस्त में मेरे,
बस नशा है ज़िन्दगी का जो सर चढ़ गया।
मौज की तलाश, फिर मौज से तलाश,
तलाश की मौज में, ठहराव बिखर गया।
अब भी सुकून की तलाश में सुकून खोया है,
क्या होगा सुकून का ग़र उम्र निकल गया।
अभी भी उम्मीद है समर्पण में ठहराव की,
इस क्षण के अर्थ और तलाश के अभाव की।
छोटी सी ज़िन्दगी में अगर थोड़े से ख्वाब हों ,
हर क्षण की महिमा हो, हर कण का हिसाब हो।
संभव है फिर प्रेम भी उतरे गहरे जीवन में,
समर्पण हो, प्रेम हो, न जज़्बातों का हिसाब हो ।
सहज ही तलाश फिर स्वमेव ही रुकेगी,
समय स्वयं ठहरेगा गर भीतर ठहराव बेहिसाब हो।
गर गहरे जीवन में सहज स्वरुप का ज्ञान हो ,
फिर कैसी तलाश हो किसका हिसाब हो।
फिर समझाए कौन किसे, हर समझ एक उलझाव है,
समझ की परिसीमा ही समझ का अभाव है।
यह कविता भी कुछ शब्द हैं बस मन का बहाव है,
कवि का ठहराव मौन है गहरा अप्रस्फुटित भाव है।
कवि की उदासी से कविता का प्रवाह है,
कवि की मौज गहरा मौन है ठहराओ है।
कब किस कवि ने खुद से मिलके कुछ लिखा हो,
हर कविता बेचैन है, कवि के भाव का अभाव है।

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