शनिवार, अप्रैल 12, 2008

सतत चाह राह की

शाम की मदहोशी में कुछ लोग थे , यादें थीं ,
सुबह की अंगराई में न मैं हूँ , न याद ही।
भटकती हुई रात में सब कुछ खो गया है,
यादों के बीतने से एक नया सवेरा हुआ है,

श्वेत दिन का पटल है, नयी स्याह चाह की,
फिर से उल्झेंगी लकीरें याद की ।
कोई रात कहीं होगी फिर आगे राह में,
फिर से बेचैन करवटें सुबह की चाह में ।

अनवरत राह चाह की ,
शामें श्याम स्याह की।
फिर धवल सुबह की राह भी,
सतत चाह राह की।

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