शनिवार, जून 13, 2009

पांडिचेरी और मैं

मेरे मैंपने में कुछ घटा है यहाँ पांडिचेरी आकर।
न सिर्फ़ 'मैं' का कद घटा है बल्कि मैंपने को नापने का पैमाना भी बदला है।
'मैं ' शुरुआत है आदमी की । वेद कहता है सबसे ऊपर, मन बुद्धि से भी ऊपर अहं है । नीचे इन्द्रियां हैं, जिससे वह संसार को जानता है। ख़ुद की शुरुआत तो होती है 'अहं' से, जहाँ से जीव ब्रह्म से अलग होता है। मगर ख़ुद को जानने का प्रयास होता है इन्द्रियों से। मैं कैसा लग रहा हूँ, लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मेरा स्थान संसार में कहाँ है इत्यादि। यह सभी मन और इन्द्रियों पर आधारित हैं। बुद्धि चाहे जितनी माथा पच्ची कर ले, नचाती तो उसे इन्द्रियां ही हैं। मगर यहाँ आकर मेरे मैंपने को समझने का पैमाना बदला है।

लोग कहते हैं ऋषि अगस्त्य की यहाँ कुटिया थी।
मैं नही जानता, मगर मानता हूँ , रही होगी ।
मानने में कोई हर्ज़ नही है। अगर नही रही होगी तो मेरा क्या जाएगा और अगर कही रही होगी तब तो मेरी चांदी है। वैसे भी अंदाज़ से दुनिया चल रही है। Newton ने अंदाज़ से प्रयोग किए। कुछ सही निकल गए तो आज वह बहुत बड़ा scientist माना जाता है। दुनिया ऐसी ही है। प्रयोग अपने लिए होते हैं । उसकी असफलताएं अपने लिए होती हैं। सफलता संसार में बाँट दी जाती है। जैसे परीक्षा पास की आपने, सफल हुए तो उसका लाभ सबको मिला। मगर असफलता अपने लिए होती है। असफलता ज्ञान देती, और सफलता संसार देती है। ज्ञान अपने लिए होता है। ज्ञान कभी भी किसी को दिया नही जा सकता। इसलिए असफलता अपने लिए होती है। तो मैं भी प्रयोग कर रहा हूँ। मान रहा हूँ की यहाँ अगस्त्य मुनि का आश्रम था। और शायद उसका कोई प्रभाव अभी भी है।
और अगर अगस्त्य ऋषि न भी रहे हों तो ऋषि औरोबिन्दो तो ज़रूर थे।
वह तो इतिहास का विषय है। उनकी पुस्तकें और ब्रिटिश सरकार की फाईलें इसका प्रमाण हैं।
अद्भुद जगह है पांडिचेरी। और यह मैं लिख रहा हूँ ७ महीने रहने के बाद। साधारणतया किसी जगह का अनुभव समय के साथ अधिक ऋणात्मक हो जाता है। इन्द्रियों का स्वाभाव ही ऐसा है। वह हर समय कुछ नया चाहती हैं। इसलिए पुरानी चीजें अपना आकर्षण खो देती हैं। शायद इसलिए ही परमात्मा ने शरीर बदलने की भी व्यवस्था की है। अगर इस शरीर से मन नही भरा तो दूसरा लेकर देखो। मगर यहाँ कुछ अलग हो रहा है। पांडिचेरी के अनुभव में शायद इन्द्रियां नही हैं। शायद यह मन और बुद्धि से परे का कोई भोग हो रहा है। आकर्षण दिन प्रति दिन बढता ही जा रहा हो।
एक ही शब्द आता है मेरे मानस में पांडिचेरी के लिए। 'शांत' । बस शांत। और कुछ भी नही। कोई हलचल भी नही, कोई कौतुहल ही नही। और यह वो शांति भी नही है जो समुद्र से आती है । समुद्र के पास अगर आप देर तक बैठें तो उसकी लहरें आपके अन्दर एक अजीब सी शांति पैदा करती हैं। बिडम्बना की समुद्र जैसे अशांत का ऐसा प्रभाव कि जो 'शांताकार' है, शांति का स्थान है (विष्णु) वह उसके अन्दर निवास करता है। यहाँ आकर मैंने कुछ कुछ अनुभव किया है, उस शांति का जो 'शांताकार' श्री विष्णु के सानिध्य से आता है।
इस शांति में कोई प्रयास नही है। कहीं जाने का उद्देश्य नही है । बस होना है। मगर इसका यह अर्थ नही कि यहाँ कुछ होता नही है, शहर रुका हुआ है। बिल्कुल नही, वह चल रहा है, कहीं धीरे, कहीं तेज। मगर इन सबके ऊपर एक शांति की चादर जैसे बिछी हो। वातावरण में कोई एक प्रकाश हो जो इन सारी गतिविधियों में एक रंग भर रहा हो। रंग ऐसा नही जो सबको एक सामान कर दे, एकाकार कर दे, बल्कि ऐसा रंग जो सब रंगों को मौलिक कर दे और साथ ही यह भी दिखे की कोई रंग चढा है इन सब पर।
पांडिचेरी की चर्चा अधूरी रह जायेगी अगर मैं 'मदर' को इसमें शामिल नही करुँ तो। क्योंकि वह रंग शायद मदर का है जिसके अनुभव की बात मैं कर रहा हूँ। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसके विचारों से मैं बहुत प्रभवित हुआ हूँ। राष्ट्र के प्रति जो संवेदना मैंने विवेकानंद में अनुभव किया था, उससे कही अधिक तड़प मैं मदर के विचारों में पता हूँ। मदर की मौजूदगी अभी भी इस छोटे शहर में है। मदर ने मानवता की जो झांकी अपने प्रयासों से संसार के सामने रखी है वह व्यापक है। ब्रह्म की चेतना जिस प्रकार समग्र सृष्टि में ओत प्रोत अनुभव होती है, वही स्वरुप मदर के चिंतन में झलकता है। यहाँ के लोग मदर को परमात्मा मानते हैं । ,मैं साधारण जानो की बात नही कर रहा, हालाँकि यहाँ का साधारण जन भी अध्यात्मिक स्तर में इतना असाधारण है की मैं उसकी थाह नही पाता हूं, बल्कि यहाँ के जो साधक हैं वे सभी सांसारिक उपलब्धियों में, चाहे वह धनार्जन हो या विद्वता, श्रेष्ठ हैं। और उनका यह मानना की मदर परमात्मा हैं, मायने रखता है । मेरे मानस में अभी बहुत कुछ नही समाया है। शायद यही कारण है की अभी कौतुहल बाकी है, और आकर्षण बढता ही जा रहा है। देखे आगे मेरे अनुभव में क्या घटित होता है।
हरे कृष्ण !

3 टिप्‍पणियां:

मुनीश ( munish ) ने कहा…

post some pictures too bhai. nice post.

Jyoti ने कहा…

Sure! Very soon. Thanks.

Aseem ने कहा…

is post ko padh kar hi thodi si shaanti ka anubhav hota hai...