शनिवार, दिसंबर 29, 2007
बौद्धिक जीवन की चुनौतियाँ
बौद्धिक जीवनचर्या कि एक समस्या यह भी है होती है कि आप जीवन की सामाजिक मूलधारा से कहीं न कहीं कट से जाते हैं। यह कहीं कहीं तो बौद्धिक्ता का पोषक हो सकता है, मगर कहीं कहीं यह उसके बेमानी हो जाने का खतरा भी पैदा कर सकता । भारतवर्ष में स्वतंत्रता उपरान्त बुद्धिजीवी वर्ग सामाजिक मूलधारा से कट सा गया हैं। समाज के पास परंपरा कि जो थाती थी उसके सौदर्य और उसकी उपयोगिता दोनो पर उपेक्षा भाव रखना पाश्चात्य जगत के प्रभाव में पलती आधुनिक शिक्षा के लिए ज़रूरी समझा गया था। किन्तु समग्र मानसिक विकास के बाद पुनः समाज से जुड़ने में असमर्थता इस शिक्षा कि असफलता भी हैं और शिक्षित मानसिकता के ऊपर प्रश्न चिह्न भी। जब तक बौद्धिकता परंपरा कि मूलधारा से नही जुड़ती, मेरी समझ से वह अपने लिए और समाज के लिए अनुपयोगी हो सकती हैं। अपने लिए तो इस तरह से कि व्यक्ति अपनी पहचान कि तलाश में समाज के मूलोछेद के बाद अंहकार में भर सकता हैं और समाज के लिए इस तरह कि समाज व्यक्तियों का समूह हैं और जब व्यक्ति ही दिशाहीन होंगे तो समाज कहाँ होगा। हरे कृष्ण!
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