सोमवार, दिसंबर 31, 2007

श्री राधे !

राधा नाम साधारण है। 'रा' और 'धा' । मगर 'रा' माने क्या ? वही 'रा' जो 'राम' में है । जैसे राम सहज हैं, राधा भी सहज है। और राम का 'र' मूर्धन्यता का प्रतीक है। जो कहीं ऊपर से आता है। जो नीचे का नही है। जिसे उच्चारण करने में जीह्वा को ऊपर तालू की तरफ जाना तो पड़ता है पर वह छू नही पाती। वैसे ही जैसे हर जीव जीवन के सम्पूर्णता की तलाश में राम के चरित्र तक जाने के लिये प्रयास तो करता है मगर उसे छू नही पाता। और राम में 'म' भी है। 'म' मतलब मन । 'म' मतलब मस्तिष्क। 'म' का उच्चारण मन में गूंजता है। मस्तिष्क में गूंजता है। मतलब की राम उस परे से मन तक उतरते हैं। 'रा' 'म' माने आकाश के तल से मन तक।और राधा ? 'रा' से 'धा' तक। धा जैसे 'धरती', धरित्री । आवाज है बिल्कुल गले के नीचे से। वैसे ही 'धा' है बील्कुल नीचे से। जमीं से । तो 'राधा' है आकाश से जमीं तक। सम्पूर्ण। और चूंकि सम्पूर्ण है इसलिये साधारण है। क्योंकि असाधारण तो किसी एक खास अंग के विशेष होने से होता है । और इसलिये असाधारण में समस्या भी होती है। हमारी राधा साधारण है। और इसलिये विशेष है। जय राधा।

1 टिप्पणी:

saurabh ने कहा…

जय राधे