गुरुवार, जनवरी 10, 2008

सत्य की समस्याएं प्रेम की दहलीज पर

हमें अक्सर लगता है कि यदि सत्य जान लिया जाये तो सारी समस्याएं हल हो जाएँ। की यदि हम जान जाएँ कि हम कौन है? कि हमारा पूर्व जन्म क्या था ? हमें किसी किसी से ही लगाव क्यों होता है ? और क्यों किसी को देखकर अनायास ही घृणा हो आती है ? तो शायद हमारी समस्याएं हल हो जाएँ।

संसार का सत्य क्या है? और उस सत्य का आधार क्या है? यह भारतीय दर्शन शास्त्रों का प्रधान विषय रहा है। हेय , हेय हेतु , हान और हानोपाय । यानी दुःख , दुःख का कारण, दुःख न होने की स्थिति और उस स्थिति को पाने का उपाय । और बार बार , शंकराचार्य से लेकर पतंजलि ऋषि तक ने अज्ञान को ही दुःख का कारण माना है। अज्ञान माने सत्य का ज्ञान न होना। तब सत्य के ज्ञान से दुःख की निवृत्ति संभव दिखती है।

तब सत्य क्या है? वेद कहते है "एकम् सद् विप्र बहुधा वदन्ति" एक ही सत्य है, उसे विद्वान लोग विभिन्न प्रकार से कहते है। और वह सत्य क्या है? " सर्वं खल्विदम ब्रह्म " दृश्य -अदृश्य सभी ब्रह्म है। "जगद मिथ्या" यह संसार मिथ्या है। अर्थात् जीवन का सबकुछ अन्तवान है , नश्वर है। इसमें कोई अर्थ नही है।

अब सत्य हमने जान लिया। तो सारी समस्याएं समाप्त हो जानी चाहिये! क्या जिन समस्यायों के साथ हमने सत्य की तलाश शुरू की थी वह समाप्त हो गयीं? नही न। मतलब सत्य से समस्याएं नही सुलझती । उलटे सत्य की अपनी समस्याएं होती है। जैसे संसार ke मिथ्या होने के सत्य के साथ यह समस्या है कि जीवन का अर्थ खो जाता है। मेरे जीवन का सारा प्रेम बेमानी हो जाता है। और जीवन जैसे ही प्रेमशून्य हुआ फिर जीवन ही नही रह जाता है।

अब हमारे अनुभव से यदि प्रेम का होना ही जीवन की वास्तविकता है और परें से अपूर्णता ही जीवन का मिटना है, तो फिर प्रेम और सत्य का संबंध समझना होगा। तभी सत्य की समस्यायों से निजात पाया जा सकता है। और प्रेम के आधार को समझा जा सकता है। कुछ लोग यूं भी कह सकते है कि प्रेम के आधार को, प्रेम के सत्य को जानने की आवश्यकता क्यों है? और ऐसे लोगों की तादाद बड़ी है। जीवन के द्वन्दों के बीच , सत्य और प्रेम के बीच, दिन की वैचारिकता और रात्रि की भावनात्मकता के बीच, चिंतन और आवेशों के बीच जीवन को झूलते हुए , एक छोर से दूसरे की ओर निरंतर गुजरते हुए गुजरना चाहते है। क्योंकि इसमें एक मदहोशी है, खुद को भूले रहने का एक नशीला अहसास है जिसे मन छोड़ना नही चाहता। इन अनुभवों के बीच से यदि मन कभी किसी का ऊपर उठे और इन थापेरों के सत्य को समझने का प्रयास करे तो वह कृष्ण के कहे "स्थित्प्रग्यता" को प्राप्त कर सकता है जिसके अभाव में अर्जुन को अपने कर्त्तव्य कर्म का अज्ञान हुआ था। और आज न प्रेम की कमी दिख रही है, न सत्य की । हर व्यक्ति किसी न किसी से प्रेम करता हुआ दिख रहा है। सिनेमा घरों में तो प्रेम की बाद दिखाई दे रही है। और यदि कला को समाज का आईना माने तो समाज में भी प्रेम जरूर है। सत्य की तो बात ही क्या है। स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक सत्य बेधर्ल्ले से बँटा जा रहा है। लोग अब अपने बारे में पहले से ज्यादा सत्य जानते है। उनकी किडनी कितनी ठीक है, उनका ब्लड प्रेशर कैसा है... वगैरह। पहले ऐसा कभी नही था। लोग अज्ञान में सारी जिंदगी जी लेते थे, उनके शरीर में एक किडनी भी है और उनका ब्लड प्रेशर किस है नहीं जान पाते थे। अब हम अपने बारे में ज्यादा सत्य जानते है। और हम ज्यादा प्रेम भी करते है। हमारे माँ बाप ने कभी एक दुसरे से "आई लोवे यू" नही कहा था। हम रोज कहते है , किसी न किसी से। तो प्रेम भी ज्यादा है और सत्य भी ज्यादा है। बस कर्तव्य परायणता नही है॥ क्योंकि स्थित प्रज्ञता नही है... अर्जुन को कोई कृष्ण नही मिलते । और न जरूरत महसूस होती है।

सत्य और प्रेम के बीच में झूलते मन के लिए , ठीक अर्जुन की तरह , कर्तव्य का निराव्लाम्ब ज्ञान चाहिये। कर्तव्य के अभाव में न व्यक्ति प्रेम में टिक पता है और न सत्ये में। वह दोनो के बीच झूलता हुआ शरीर और समय दोनो गुजार देता है। और जाते जाते एक ऐसा समाज छोड़ जाता है जिसे आने वाले लोग न त्याग पाते है न सुधार पाते है।

तो सत्य की अपनी समस्याएं है और प्रेम की भी । यह समस्या तब वीभत्स हो जाती है जब सत्य का अन्वेषक प्रेम की दहलीज पर पहुँचता है। और कर्तव्य के ज्ञान के अभाव में जीवन के अर्थ को अनर्थ करता हुआ समाज और परंपरा की दुहाई देता दिखाई देता है।

"गहना कर्मणो गतिः " कृष्ण गीता में कहते है। इस कर्तव्य को समझना गहन है। कठिन है। और यह समझने के लिए कृष्ण के पास ही जाना होगा।

हरे कृष्ण॥ हरे कृष्ण ॥ कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

2 टिप्‍पणियां:

saurabh ने कहा…

तो सत्य की अपनी समस्याएं है और प्रेम की भी । यह समस्या तब वीभत्स हो जाती है जब सत्य का अन्वेषक प्रेम की दहलीज पर पहुँचता है। और कर्तव्य के ज्ञान के अभाव में जीवन के अर्थ को अनर्थ करता हुआ समाज और परंपरा की दुहाई देता दिखाई देता है।


Can u please elaborate more on this..

Jyoti ने कहा…

Which part dear saurabh? if you enquire about the problem being compounded, then it is with respect to the two models of theinking one adopts in life towards understanding himself/herself...love and logical deductions. and when logic is applied to love and the problem becomes incomprehensible from either of the viewpoints then one curses the bounding traditions of the society which one is born in for creating such rigidities in expresions of love... Hare krishna!