सोमवार, जनवरी 21, 2008

ज़माने से अलग

ज़माने से अलग दो कदम क्या चल दिए,
उठते निगाहों ने सवाल कर दिए।
कुछ सवाल हम से किये कुछ सवाल खुद को दिए,
कोई सवाल न उठा जिंदगी के मकसद के लिए।

की हम भी कोई हैसियत है खुद में ,
न ज़िंदगी है दूसरो के तजुर्बों की हद में ।
जीये ही क्या जो ज़िंदगी न हो अपनी,
दूसरो के इरादों में हों पूरी साँसे अपनी।

निगाहें उठीं, कुछ आहें उठीं ,
उपहासों के साथ ठहाके उठीं।
न उठीं तो बस उनकी गिरी नज़र न उठीं,
जिनके गिरने से हमारी मंजिल उठीं।

अभी भी सही है बस नज़र अपनी,
सबकी बदली बस न नज़र अपनी।
अभी भी उठती है उसी इज्ज़त से,
खुद को परखती है नज़र अपनी।

1 टिप्पणी:

Abhi ने कहा…

accha hai..padh kar accha laga [:)]