जिंदगी की रफ्तार जो बदने लगी
दृष्टि का वितान कुछ घटने लगा
नज़र थी क्षितिज तक फैली हरियाली
दामन के काँटों में खोने लगा
कभी हंसी की रुसवाई, कभी रुसवाई की हंसी
चाँद तारों का मकसद खोने लगा
वो नदी का चहकना, हवा का बौराना
बेमानी सारा मंज़र लगने लगा
अभी भी फ़क्त सुनहला एक आँचल
झुकी सी नज़र, भिंगा सा काजल
छिटकी एक हंसी , रुप हँसता हुआ
जिंदगी का मकसद कुछ सिमटता हुआ
सोमवार, फ़रवरी 11, 2008
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1 टिप्पणी:
Gadrej... maja aa gaya...
Zindagi ka maksad kuchh simatata hua
aur aapke kaavya ka kshitij kuchh failata hua...
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