शनिवार, अप्रैल 12, 2008

कर्तव्य और विज्ञान

कुछ महीनों पहले लिखे अपने ही ब्लॉग की कुछ पंक्तियाँ आज के अनुभव को अभिव्यक्त करने में सहयोगी प्रतीत होती है।

"सत्य और प्रेम के बीच में झूलते मन के लिए , ठीक अर्जुन की तरह , कर्तव्य का निराव्लाम्ब ज्ञान चाहिये। कर्तव्य के अभाव में न व्यक्ति प्रेम में टिक पता है और न सत्ये में। वह दोनो के बीच झूलता हुआ शरीर और समय दोनो गुजार देता है। और जाते जाते एक ऐसा समाज छोड़ जाता है जिसे आने वाले लोग न त्याग पाते है न सुधार पाते है।

तो सत्य की अपनी समस्याएं है और प्रेम की भी । यह समस्या तब वीभत्स हो जाती है जब सत्य का अन्वेषक प्रेम की दहलीज पर पहुँचता है। और कर्तव्य के ज्ञान के अभाव में जीवन के अर्थ को अनर्थ करता हुआ समाज और परंपरा की दुहाई देता दिखाई देता है।"

भारतीये समाज और परम्पराओं के मूल में जो जीवन दर्शन है वह बार बार मुझे ऊपर अभिव्यक्त समस्याओं के उत्तर की व्याख्या दिखाई देती है। जीवन और जीवन के अर्थों जैसे, संबंधों, मूल्यों इत्यादी के प्रति सजग होने के प्रयास में व्यक्ति अक्सर प्रेम, सत्य और कर्तव्य से जूझता दिखाई देता है। कर्तव्य की ही दूसरी व्याख्या वेद 'धर्म'शब्द से देते है । जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि धर्माचरण बता कर वेद कर्तव्यपरयणता को ही प्रधान देते दृष्टिगोचर होते है। क्योंकि 'धर्मं शब्द का प्रायोगिक औचित्य कर्तव्य के अर्थ में ही परिलाक्षिता होता है। जैसे हम कटे है ... ' मेरा धर्मं यह नही है', मैं धर्मं संकट में फँस गया हूँ ' ..इत्यादी ।

शास्त्रों द्वारा निर्धारित धर्मं की परिभाषा को न जीवन के उद्देश्ये के सम्बन्ध से अथवा उनके द्वारा निर्गत धर्म रूपी कर्तव्यों को ही विज्ञान जीवन या सृष्टी का उद्देश्य मनाने को तैयार है। प्रेम विज्ञान की समस्या नही है। वह इसे नही समझ सका है और न ही इसमे अपनी उर्जा देने को तैयार है। कर्तव्य का निर्धारण विज्ञान 'system' के 'functional' रहने के संदर्भ में करता है। जब तक एक संस्था कार्य करने में समर्थ है, विज्ञान उसे सफल मानता है। 'cosystem' के संदर्भ में भी जब तक वह कार्य करता प्रतीत होता है , विज्ञान उसे 'मेम्बेर्स' के कर्तव्यों का अन्वेषण करने को टायर नही होता है। वह मानता है की प्रकृति स्वतः जिम्मेवार है सभी कार्यों के लिए और प्रकृति उसके लाभान्वित होने वालों को अकारण वह लाभ दे रही है। यदि प्रकृति में कोई विकार आता है तो उन कारणों को खोजने में उर्जा तो लगाई जा सकती है, उन कर्तव्यों की पुनः व्योख्या की जा सकती है जिनके पूरा न होने से प्रकृति रूपी 'system' में विकार आया है। जैसे जब तक 'ग्रीन होउस इफ्फेक्ट' न हो जाए तब तक यह जानने की संभावना नही है की अभी तक ग्रीन होउस क्यों नही हुआ। सत्य के अन्वेषण के प्रति विज्ञान की प्रतिबधता पर संदेह नही किया जा सकता। किंतु उस सत्य के उपयोग पर परसना चिह्न जरूर लगाया जा सकता है जो जीवन मूल्यों को कर्तव्यों के आधार पर रेखांकित न कर सके। ऐसे कर्तव्य जो सत्य के अनुसंधान से और प्रेम के प्रकाश में जीवन को अधिकाधिक आनंदित और सृष्टी को अधिकाधिक जीवन योग्य बनाने में सक्षम हों विज्ञान अपनी पद्धति के कारण नही कर पाता । अब सवाल यह है की यदि सत्य का अन्वेषण जीवन को सम्रिधा और आनंदित करने मैं असफल हो तो ऐसे सत्य का अनुसंधान मानव मस्तिस्क की एक अंहकार को पूरित करने का बचकाना प्रयास भर नही है?

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