ज़िंदगी ढ़ल रही है, मगर यादों की मदहोशी बाकी है,
फिक्र है खुदा ने पूछा तो क्या कहूँगा, कि कौन साकी है ।
पिलाया है मद में चूर जिसने इस नशे मन से रूह तलक,
वो फरिश्ता है, मुहम्मद या क़यामत, या केवल साकी है?
सोमवार, जून 02, 2008
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1 टिप्पणी:
बढ़िया है.
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