शनिवार, जून 14, 2008

कवि और कविता

बहुत चाहा,
कि
मेरी कोई कविता मेरी ही रहे
कि मेरा अपनापन कायम रहे उससे, लिखे जाने के बाद भी ।
मगर हर बार मेरे सामने वह कागज पे जा चिपकती है
और फिर वह मेरी अपनी कभी नही लगती है।

कोई फर्क नहीं ढ़ूंढ़ पाता हूँ मैं,
मेरी कविता और किसी अन्य की रचना में
कोई साम्य नही मिलता मुझे 'मैं' और मेरे शब्दों में

वह कविता जो सादे पन्नों पे बिखर जाती है,
मेरी ही शक्ल में कुछ देर नज़र आती है,
फिर वह सामान्य लगती हैं
कोई सम्बन्ध नही जोड़ पाता मैं उसके उस कागज पर पहुँचने के बाद।
जैसे मेरा उससे कोई रिश्ता ही न हो।

और वह कविता भटकती है अपनी ही रूह पा,
न जाने कहाँ कहाँ पहुँचती है, अपनी ही कदमों से ।
नही देखा था उसके पैरों को मैंने जब उसे सहेज कर
धीरे से नर्म कागज़ के सफ़ेद बिछोने पे रखा था।
बहुत देर तक निहारता रहा उसके सौंदर्य को ।

और अचानक किसी ने 'वाह' की,
कविता कुनमुनाई,
पैर पटके।
आह, वाह के फिर दौर आ निकले ,
कविता के पैर चले।
कहाँ कहाँ नही गयी,
कविता अपनी ,
वह दौड़ गयी,
ख़ुद ही मंजिलें अपनी ।

बस वह कविता नही रही
कविता अपनी

मैं बेबस ,
कुछ उत्साहित,
देर तक ,
कुछ दूर तक
उसे देखता रहा।
सच अब उस कविता में मेरा
अपना कुछ भी नही रहा।

आज मैंने जाना
मेरी मां ने भी देखा था ,
यूं ही दूर तक जाते हुए मुझे ,
जैसे कोई कविता निकली हो उसके दर से ।
उसकी कविता को पैर हुए
एक अरसा हो चला हैं,
उस कविता ने हर कहीं कदम रखा है,
मंचो पे जब भी वो चढ़ा है,
आह वाह ही मिला है।
आज कद्रदां कविता को ढ़ूंढ़ते हैं,
कवि की तलाश कौन करता है इधर।

न दस्तूर हैं निगाहे मंच का,
की कविता कवि की गुलाम रहे।
इस दौड़ में कवि बेमतलब है,
काफी है कि बस कविता की पहचान रहे ।

बचपन में कितने ही कवियों की कवितायें,
मैंने यूं ही पढ़ सुनाये,
स्कूल के मंच से ।
वाह वाह के लोभ में,
कविता बहुत आगे निकल आयी
,
कवि कही पीछे रह गया,
कोई कविता अब कवि का हिस्सा नही ,
हर कविता ख़ुद कवि हो गया।

6 टिप्‍पणियां:

jasvir saurana ने कहा…

bhut hi sundar rachana hai.badhai ho.

डॉ .अनुराग ने कहा…

वाकई कविता आगे निकल गई है.....आपकी कविता ने परोक्ष रूप से काफ़ी कुछ कह डाला है......

बालकिशन ने कहा…

वाह! वाह!
कितनी सुंदर बात कह दी आपने!

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

वाह वाह के लोभ में,
कविता बहुत आगे निकल आयी,
कवि कही पीछे रह गया,
कोई कविता अब कवि का हिस्सा नही ,
हर कविता ही ख़ुद का कवि हो गया।

बिलकुल सच लिखा है आपने..

***राजीव रंजन प्रसाद

Udan Tashtari ने कहा…

एक सार्थक अभिव्यक्ति. बधाई.

Jyo ने कहा…

Wow! great piece!
and the comments here remind me of a 'kavi sammelan':)
where ru nowadays?