शुक्रवार, जून 06, 2008
जीवन का वृत्त
आज शाम अचानक घने बादल आए । फिर झमाझम बूंदें धरती की ओर दौड़ पड़ीं। जैसे स्कूल से लौटते बच्चे अपनी माँ की ओर दौड़ते हैं, लिपट जाते हैं । वे बच्चे जैसे अपने सारे अस्तित्व को, जिससे उन्होंने दिन भर सब शैतानियाँ की हों उसे मिटा देना चाहते हों। और अपनी माँ के स्वच्छ धवल साड़ी के पल्लू में अपने स्व को खो देना चाहते हों।
जीवन का वृत्त पूरा होता है । सुबह की टाटा से शाम के लौटने तक ।
जैसे बादल लौटते हैं धरती पे।
सूरज की चमक से चकाचौंध धरती की बूंदें सूरज की चाह में, उसकी लालसा से वाष्प बन जाती हैं। और अपने प्रियतम को छोड़ ऊपर उठती हैं।
धरती हमेशा नीचे है। प्रेम हमेशा नीचे उतर कर मिलता है। आदमी की चाहतें उसे ऊपर उठने को प्रेरित करती हैं। उसे स्वप्निल बनाती हैं । वह उस अन्बूझ को पाने के लिए प्रेरित हो उठता है जिसकी केवल चमक उसने देखी है। बूंदें भी ऊपर उठती हैं ।
गर्द की परतों पे बैठ बादल बन जाती है । गर्द उसे बैठने की जगह भी देती है और सूरज तक की उड़ान से थकी उसकी चाहतों को विश्राम भी ।
गर्द धरती का ही हिस्सा है , जैसे वह बूंद जो सूरज की चाह में वाष्प बनी थी।
गर्द भी हवा से प्रीत कर बैठा और उड़ा था हवा बनने के लिए।
तो उस बूँद को गर्द मिल गया। गर्द से उसे धरती की याद आई । अपने आराम का ख्याल रखने वाली धरती। जिसने सब कुछ धारण किया था। उसे तब से सहेजा था जब वह लोगों की आंखो से दूर एक नन्ही सी बूँद थी। दूब पर सिमटी हुई। उसने उसे अपने अन्तर के प्रेम के तालाब का हिस्सा बनाया था। आज फिर से उस बूँद को अपनी धरती की याद आई । धरती भी बूँद बिन जल रही थी। अपने अधूरेपन को, बूँद के बिना अपने अस्तित्व को कोस रही थी।
तभी धरती की याद से संघनित, वाष्प से बूँद बन, वह धरती का हिस्सा धरती से मिलने लौट आया। धमाधम , दौड़ते हुए, जैसे बच्चे लौटते है माँ के पास स्कूल के बाद।
खूब बारिश हुई और कुछ बूँदें हमारी आंखों से भी निकल पड़ी । क्या मिलन था । लौटने का सफर ही तो सफर होता है। जैसे बूंदे जब धरती पर लौटती हैं तो कई आंखे उसे निहारती हैं। बच्चे खुशी नाचते हैं। कोई गीत बनता है।
आज खूब बारिश हुई । और मेरा अन्तर भी गहरे भींग गया।
जीवन का वृत्त पूरा होता है।
जो जहाँ से चला उसे वहाँ लौटना होता है। नही की यह मजबूरी है, मगर यह ज़रूरत है अस्तित्व के लिए।
आत्मा का परमात्मा की तरफ़।
पिता से पुनः पिता बनने तक। जब पिता की सबसे अधिक याद आती है।
अलग होने के बाद पुनः झगड़ने के लिए उस नुक्ताची की तरफ़ ।
उन्ही बादलों को देख मेरा मन भी लौटता है ।
अपने अन्तर में। कुछ खोया ढ़ूँढ़ने को।
लौटने के सफर में बारिश तो होती है।
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3 टिप्पणियां:
अच्छा लिखा है.
जीवन का इतना सुंदर चित्रण ।
जीवन वृत्त है इसमे कोई शक नही है।
गोल-गोल घूमकर फिर वहीं, चक्र चलता रहता है,जीवन वृत्त ही तो है... अच्छी उड़ान भरी है आपने.
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