मैंने छोटे सपने देखे,
सोचा कीमत कम देनी होगी।
छोटे से जीवन की,
थोड़ी खुशियाँ गिरवी होंगी।
दुनिया के बाज़ार का,
मगर हाल बहुत बुरा निकला।
मेरे सारे जीवन की कीमत,
मेरी खुशिओं से कम निकला।
बहुत दुकान भटकने पे,
मेरा एक कद्रदां निकला।
वादे किए , गले लगाया,
फिर फरेब का यार निकला।
भोली सी नज़र जब उसकी,
इतनी शातिर हो सकती है।
और दुकानें क्या ढूंढ़ना
उनकी ख्वाहिश क्या कम होगी?
सोचता हूँ क्यों सपने देखूं,
अपनी खुशियाँ क्यों कर बेचूं ।
राम द्वारे, हो मतवाले,
प्रेम करूं और अर्पित कर दूँ।
बुधवार, जून 04, 2008
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2 टिप्पणियां:
राम द्वारे, हो मतवाले,
प्रेम करूं और अर्पित कर दूँ।
-सही है. यह भी एक स्वपन का ही तो रुप है.
राम द्वारे, हो मतवाले,
प्रेम करूं और अर्पित कर दूँ।
बढ़िया है.
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