क्या उम्मीद करें इश्के जुनूं का इस दौर में,
दफ्तरी खतों में घर के फूल भेजे जाते हैं।
यह कटे सरों और खंज़रों का दौर है ,
कौन रूठे- मनाये, बस सर सहेजे जाते हैं।
Towards understanding self from knowledge perspective, with compassion to contemporary identities and ideations towards richer ones.
2 टिप्पणियां:
सही है.
उम्मीद पर तो दुनिया टिकी है भाई... हम तो कब से उम्मीद लगाए बैठे हैं. :-)
वैसे सही बात लिखी है आपने.
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