अब नकाबों के हौसले भी बुलंद हो गए हैं,
जब से खालिस आदमी दिखने कुछ कम हो गए हैं।
शरारत से निरखते हैं, बड़े ही गौर से परखते हैं,
गोया नकाबों के शहर में, मैं चुनिंदा ही अजायब हूँ।
Towards understanding self from knowledge perspective, with compassion to contemporary identities and ideations towards richer ones.
5 टिप्पणियां:
गोया नकाबों के शहर में, मैं चुनिंदा ही अजायब हूँ।
-बहुत खूब.
बहुत अच्छा लिखा आपने.
बिल्कुल सही.
बधाई.
बधाई हो आप तो शायर निकले !
बहुत खूब.......क्या बात कही...नकाबो के हौसले....
bahut badhiya...
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