बुधवार, जून 11, 2008

अब नकाबों के हौसले भी बुलंद हो गए हैं,

जब से खालिस आदमी दिखने कुछ कम हो गए हैं।

शरारत से निरखते हैं, बड़े ही गौर से परखते हैं,

गोया नकाबों के शहर में, मैं चुनिंदा ही अजायब हूँ।

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

गोया नकाबों के शहर में, मैं चुनिंदा ही अजायब हूँ।

-बहुत खूब.

बालकिशन ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने.
बिल्कुल सही.
बधाई.

Abhishek Ojha ने कहा…

बधाई हो आप तो शायर निकले !

डॉ .अनुराग ने कहा…

बहुत खूब.......क्या बात कही...नकाबो के हौसले....

pallavi trivedi ने कहा…

bahut badhiya...