रविवार, जून 08, 2008

खाली पन्ने बिना खालीपन के

सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद एक शून्य बचता है जो आरंभ के पहले से ज्यादा खाली लगता है ।

जैसे हर कविता अपने पीछे एक सादा पन्ना छोड़ जाती है । शब्दों के बहाव के बाद फिर से रेत की परतें दिखाई देती हैं। उस रेत पे बहाव के चिन्ह, उभार और लकीरें शब्दों के गुज़र जाने का अहसास भी दिलाती हैं और उसके बाद की खामोशी अधिक खाली लगती है ।

उसके आने के पहले कुछ था नही । मगर उसके नही होने का अहसास भी तो नही था। भूमि उर्वर थी मगर उसे एक वृक्ष की आवश्यकता नही थी । कहीं से किसी पक्षी ने एक बीज डाल दिया । भूमि तो उर्वर थी ही , उस बीज में संभावनाएं भी थीं। सो वृक्ष बनते देर नही लगी। एक दिन एक आंधी आयी और उस वृक्ष को झुकना नही आया। उसे अपने उर्वर भूमिं का भरोसा था । आंधी किसी को कहाँ पहचानती है। और गर चट्टानों को कही वृक्ष ने अपनी जड़ों से जकड़ा होता तो सम्भावना भी थी। यहाँ तो ज़मीं उसके प्रेम से नम थी। सो आंधी उस वृक्ष को उड़ा ले गयी। अब वह भूमि सुनसान लगती है। वृक्ष था नही। किसी को अहसास भी नही था की एक वृक्ष हो सकता है यहाँ पर। मगर वहाँ एक वृक्ष पनपा और अब सब कहते हैं, यह जगह खाली लगती है।

कुछ लोग अब इस दुनिया में नही रहे । वे नही थे तो कमी नही थी ... मगर अब उनके बिना सब सुना लगता है। क्या हमारे नही होने का अहसास भी इतना ही गहरा होगा? तो होने का क्या अर्थ था? क्या हमारा होना इसलिए ही था की हमारे न होने पे एक जगह खाली दिखे?

कबीर कहते हैं...

दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

माने वृक्ष के न होने का अहसास न हो । माने कविता जब लिखी जाए तो उसके गुजर जाने पे कोई खालीपन न आए। कोई सादा पन्ना न हो जो कविता के लिखे जाने से पहले से ज्यादा सादा लगे।

जैसे आने वाली सदियाँ, हमारे उपयोग किए प्लास्टिक को अपना सरदर्द न माने। हमारे द्वारा सारी धरती को कंक्रीट से पटा देख उन्हें अपनी संभावनाएं कम न लगे। की उनके पास भी हो एक उर्वर भूमि मगर जिसपे दाग न हो अपने पहले गुज़र गए किसी वृक्ष की याद का। कविता के बाद का पन्ना खाली तो हो मगर पहले से ज्यादा नही।

3 टिप्‍पणियां:

शायदा ने कहा…

जितना खालीपन पसरा है वहां उतनी ही गहराई भी नज़र आई। बहुत सुंदर।

Abhishek Ojha ने कहा…

चिंतन भरा लेखन है... एक सुझाव है टिपण्णी वाले पेज से word verification हटा दें.. सहूलियत होती है टिपण्णी करने वालों को.

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया विचार, उम्दा आलेख. बधाई.